एशियन गेम्स 2026 में भारत के लिए पहले पदक का इंतजार खत्म हो गया है। मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स के महिलाओं के 60 किग्रा वर्ग में सुचिका तारियाल ने क्वार्टर फाइनल मुकाबले में मंगोलिया की अल्तानचिमेग बैगलमा को 2-0 से हरा दिया।अल्तानचिमेग बैगलमा 2025 की IMMAF विश्व चैंपियन रह चुकी हैं। इस जीत के साथ सुचिका सेमीफाइनल में पहुंच गईं और एशियन गेम्स में एमएमए में भारत का पहला पदक भी पक्का कर दिया।
36 साल की सुचिका का कम से कम कांस्य पदक पक्का हो गया है। एमएमए इस बार एशियन गेम्स में पहली बार शामिल किया गया है। सुचिका की नजर अब सेमीफाइनल से आगे बढ़कर फाइनल में पहुंचने और स्वर्ण पदक जीतने पर होगी। जूडो और जू-जित्सु में सफलता के बाद सुचिका ने एमएमए का रुख किया था। वह 2022 हांगझोउ एशियन गेम्स में कुराश में भी भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं।
एक घटना ने बदली जिंदगी, 12 साल की उम्र में शुरू हुआ सफर
सुचिका का खेल सफर जूडो से शुरू हुआ था। भारतीय खेल प्राधिकरण के मुताबिक, जब वह 12 साल की थीं, तब उनके साथ हुई एक छेड़छाड़ की घटना के बाद उन्होंने आत्मरक्षा के लिए जूडो शुरू किया था। सुचिका ने बताया कि दिल्ली के एक यूनिसेक्स सैलून में उनके साथ गलत तरीके से छूने की घटना हुई थी। उन्होंने कहा, 'मैं स्वभाव से आक्रामक हूं, लेकिन उस वक्त मुझे इतना कमजोर और असहाय महसूस हुआ कि मैं कुछ नहीं कर सकी।' इस घटना के बाद उन्होंने तय किया कि वह दोबारा खुद को इतना असहाय महसूस नहीं करना चाहेंगी। उन्होंने कहा, 'मुझे अपनी रक्षा के लिए कुछ सीखना चाहिए। मुझे लड़ने की कला आनी चाहिए।'
जूडो की ट्रेनिंग शुरू करने से पहले उन्होंने खुद ही शारीरिक तैयारी शुरू कर दी थी। उनके घर के पास खाली पड़े मकान में वह चिन-अप और पुश-अप करती थीं। इलाके में पानी का टैंकर आने पर वह बाल्टियों में पानी भरकर चौथी मंजिल स्थित अपने घर तक ले जाती थीं। उनके मुताबिक, इसी दौरान उनकी कोर स्ट्रेंथ मजबूत हुई। हरियाणा के रोहतक की सुचिका आगे चलकर जूडो में भारत की प्रमुख खिलाड़ियों में शामिल हुईं। उन्होंने आठ बार राष्ट्रीय जूडो चैंपियन बनने के साथ 20 से अधिक अंतरराष्ट्रीय जूडो प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व किया। 2019 में उन्होंने कॉमनवेल्थ जूडो चैंपियनशिप और दक्षिण एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता, जबकि 2018 कॉमनवेल्थ जूडो में रजत पदक हासिल किया।
क्वार्टर फाइनल में जीत के बाद सुचिका
- फोटो : Twitter
जूडो में तेजी से बनाई पहचान
करीब 2000 में उन्होंने जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में जूडो की क्लासेस शुरू कीं। कुछ ही समय में उन्होंने आयु वर्ग की प्रतियोगिताओं में पदक जीतने शुरू कर दिए और कुछ वर्षों में जूनियर राष्ट्रीय स्तर पर भी पदक हासिल किया। इसके बाद वह जूडो में आठ बार की राष्ट्रीय चैंपियन बनीं।
मौके मिले, लेकिन आर्थिक मुश्किलें भी रहीं
2018 में सुचिका 48 किलोग्राम वर्ग में एशियन गेम्स के लिए दावेदार थीं, लेकिन भारत ने इस वर्ग में खिलाड़ी नहीं उतारा। उनके पति कपिल हुड्डा के मुताबिक, उस समय सुचिका का करियर अपने चरम पर था। इसके अगले साल उन्होंने कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता। हालांकि, उनके करियर की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक आर्थिक समस्या रही। लंबे समय तक उन्हें पर्याप्त आर्थिक मदद नहीं मिली और जूडो की रैंकिंग प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने का खर्च परिवार को खुद उठाना पड़ता था। कोचिंग, ट्रेनिंग, डाइट और सप्लीमेंट्स का खर्च भी बढ़ता गया। कपिल हुड्डा के मुताबिक, उन्होंने सुचिका के खेल करियर को जारी रखने के लिए अपनी बचत लगाई और कर्ज भी लिया। उन्होंने बताया कि उन पर करीब 20 लाख रुपये का कर्ज लंबित है।
लोकप्रिय भी हैं सुचिका
जूडो में सफलता के साथ-साथ सुचिका तरियाल को लोकप्रियता भी मिली। उन्हें भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने सम्मानित किया है। यह सम्मान उन्हें चार वर्ल्ड चैंपियनशिप और 30 से अधिक अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में देश का प्रतिनिधित्व करने के साथ-साथ एथलेटिक उत्कृष्टता, युवाओं पर प्रभाव और महिला सशक्तिकरण की मिसाल पेश करने के लिए मिला। तरियाल एमटीवी रोडीज और प्राइम वीडियो के 'इंडियाज अल्टीमेट वॉरियर' जैसे लोकप्रिय टीवी शो में भी नजर आ चुकी हैं।
जूडो से जू-जित्सु और फिर एमएमए
जूडो के बाद सुचिका ने जू-जित्सु का रुख किया और 2024 में जेजेआईएफ जू-जित्सु विश्व चैंपियनशिप में एडल्ट्स जू-जित्सु कॉन्टैक्ट महिला 63 किग्रा वर्ग में स्वर्ण पदक जीता। उन्होंने 2017 में एमएमए में डेब्यू किया था और जीत के साथ शुरुआत की। हालांकि, इसके बाद उन्होंने सात साल तक एमएमए से दूरी बनाए रखी और जूडो तथा जू-जित्सु में प्रतिस्पर्धा जारी रखी। नवंबर 2024 में उन्होंने ब्रेव कॉम्बैट फेडरेशन के साथ करार किया और दिसंबर 2024 में बहरीन में ब्रेव सीएफ 92 से पेशेवर एमएमए में वापसी की, जहां उन्होंने जीत दर्ज की। सुचिका ने एमएमए को अपने लिए मार्शल आर्ट्स का सबसे संपूर्ण स्तर बताया है। उन्होंने कहा, 'जूडो ने मुझे एमएमए के लिए तैयार किया। जूडो की वजह से मेरी ग्राउंड फाइटिंग और ग्रैपलिंग मजबूत थी। मुझे सिर्फ स्टैंडिंग गेम और स्ट्राइकिंग सीखनी थी।'
पदक से कुछ सेकंड दूर रह गईं
2022 कॉमनवेल्थ गेम्स में सुचिका पदक के बेहद करीब पहुंची थीं, लेकिन कांस्य पदक के मुकाबले के आखिरी सेकेंड में हार गईं। यह हार उनके लिए इसलिए भी ज्यादा मुश्किल थी क्योंकि एक पदक उनके लिए सरकारी पुरस्कारों और आर्थिक स्थिति में सुधार का रास्ता खोल सकता था। उनके पति कपिल हुड्डा के मुताबिक, इस करीबी हार का सुचिका पर काफी असर पड़ा और वह लंबे समय तक इस नतीजे के बारे में सोचती रहीं।
बहरहाल यह सुचिका का दूसरा एशियन गेम्स है। 2022 हांगझोउ एशियाड में उन्होंने कुराश में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। उस समय उन्हें पदक नहीं मिला था। अब चार साल बाद वह एमएमए में भारत के लिए पदक पक्का कर चुकी हैं। सुचिका ने हांगझोऊ के अनुभव को याद करते हुए कहा था, 'जिंदगी ने मुझे एशियन गेम्स में दूसरा मौका दिया है। हांगझोउ में चीजें मेरी उम्मीद के मुताबिक नहीं हुईं। इस बार मैं एमएमए के लिए पूरी तरह तैयार हूं।'
विश्व चैंपियन बनीं, फिर भी खर्च बना बाधा
जू-जित्सु में विश्व चैंपियन बनने के बाद सुचिका इसी खेल में आगे बढ़ना चाहती थीं और एक और एशियन गेम्स में जगह बनाने का लक्ष्य था। लेकिन अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने का खर्च उनके लिए बड़ी समस्या बना रहा। उन्होंने बताया कि पहले महासंघ एक टूर्नामेंट के लिए करीब एक से डेढ़ लाख रुपये मांगता था, लेकिन बाद में यह खर्च बढ़कर करीब तीन से चार लाख रुपये हो गया। उनके लिए यह रकम जुटाना मुश्किल था।
एमएमए ने दिया खेल और कमाई दोनों का रास्ता
2025 में सुचिका ने एमएमए का रुख किया। भारतीय एमएमए महासंघ की ओर से उन्हें पेशेवर मुकाबलों के प्रस्ताव मिले। पहली बार उन्हें लगा कि यह बदलाव खेल के साथ आर्थिक रूप से भी मददगार हो सकता है। उनके पति कपिल हुड्डा के मुताबिक, पेशेवर मुकाबलों के लिए भुगतान मिलता था और सुचिका को कई फाइट के अनुबंध की पेशकश की गई थी। परिवार ने आर्थिक स्थिति को देखते हुए यह प्रस्ताव स्वीकार किया।
अब नजरें स्वर्ण पर
इस साल जनवरी और मई में एशियाई एमएमए चैंपियनशिप में लगातार कांस्य पदक जीत चुकीं सुचिका को एशियन गेम्स में कड़ी चुनौती का अंदाजा है। मुंबई की वन पंच अकादमी में कोच निखिल कुंदर के साथ उन्होंने तैयारी की है। अब क्वार्टर फाइनल में जीत के बाद कांस्य पदक पक्का हो चुका है, लेकिन सुचिका की चुनौती यहीं खत्म नहीं हुई है। सेमीफाइनल में उनका लक्ष्य पदक का रंग बदलकर स्वर्ण तक पहुंचना होगा।
ग्राउंड गेम मजबूत, अब स्ट्राइकिंग पर जोर
जूडो, कुराश और जू-जित्सु के अनुभव ने सुचिका का ग्राउंड गेम मजबूत कर दिया था। एमएमए में आने के बाद उनकी ट्रेनिंग का मुख्य फोकस स्ट्राइकिंग, किकिंग और बॉक्सिंग पर रहा। उन्होंने बताया, 'उन्होंने कहा कि मेरा ग्राउंड और पाउंड अच्छा है, लेकिन मुझे स्ट्राइकिंग, किकिंग और बॉक्सिंग पर काम करने की जरूरत है। अब मैं सिर्फ पदक के साथ इस सफर को खत्म करना चाहती हूं। मैंने इस सफर में बहुत कुछ लगाया है और मैं पीछे मुड़कर यह नहीं देखना चाहती कि मैंने कुछ हासिल नहीं किया।'