साल 1952 के ओस्लो ओलंपिक में मशाल ने पहली बार हवाई मार्ग से यात्रा की, 1956 के स्कॉटहोम ओलंपिक में घोड़े की पीठ पर मशाल यात्रा संपन्न हुई। 1968 के मैक्सिको ओलंपिक में मशाल को समुद्र के रास्ते ले जाया गया।
1976 के मांट्रियल ओलंपिक में कनाडा ने एथेंस से ओटावा तक मशाल के सफर का सैटेलाइट प्रसारण किया। 1994 के लिलेहैमल शीतकालीन खेलों के दौरान पैराजंपिंग करने वाले खिलाड़ियों ने पहली बार हवा में मशाल का आदान-प्रदान किया। 2000 के सिडनी ओलंपिक में तो मशाल को ग्रेट बैरियर रीफ के पास समुद्र की गहराइयों में उतारा गया।
मशाल गैस से जलती है, समय के साथ इसके स्वरूप, रंग और इसके बनाने में उपयोग होने वाली वस्तुएं बदलती रही हैं, लेकिन प्राचीन समय से लेकर आज तक इसका मूल स्वरूप नहीं बदला। 2000 में सिडनी ओलंपिक के दौरान मशाल को सिडनी ओपरा हाउस और बूमरैंग का आकार दिया गया। बीजिंग ओलंपिक में मशाल एल्यूमिनियम और मैग्नीज से मिलकर बनी, इस मशाल को कंप्यूटर कंपनी लिनोवो के 30 डिजाइन विशेषज्ञों ने तैयार किया था।
टोक्यो ओलंपिक के आयोजकों ने बताया है कि मशाल का शीर्ष हिस्सा चेरी ब्लॉसम के आकार का है और इसमें वही तकनीक इस्तेमाल की गई है जो जापान की बुलेट ट्रेन बनाने में की जाती है। टोक्यो ओलंपिक की मशाल सुनहरे गुलाब की तरह चमकदार है, यह 71 सेंटीमीटर लंबी और एक किलो 200 ग्राम वजन की है। इसमें 2011 में भूकंप और सुनामी पीड़ितों के लिए अस्थायी मकान बनाने में इस्तेमाल किए गए एल्युमिनियम से निकले अपशिष्टों का इस्तेमाल किया गया है।