धोनी के खेल और आंकड़ों के बारे में तो आप सभी ने काफी कुछ पढ़ा और सुना होगा इसलिए क्रिकेट की बातें कम करुंगा। धोनी के करीबी और दोस्त होने का दावा तो उनके साथी खिलाड़ी भी नहीं कर सकतें हैं, लेकिन जितना मौका मुझे मिला और जितना मैंने उन्हें देखा, उससे एक ही बात जेहन में आती है- धोनी इतने बड़े सुपरस्टार होकर भी इतना विनम्र कैसे हो सकते हैं। मुमकिन ही नहीं है। विनम्र तो सचिन तेंदुलकर भी थे और हैं, द्रविड़ भी हैं, लेकिन धोनी इन दोनों से कैसे अलग थे?
सार्वजिनक स्थानों पर ये साफ था कि तेंदुलकर-द्रविड़ की विनम्रता एकदम स्वभाविक नहीं थी। ऐसा कहने का बिल्कुल ये मतलब नहीं है कि वो किसी तरह का लिबास ओढ़ते थे या उनकी आलोचना करना है। बस, धोनी के साथ ये विनम्रता बेहद सहज लगती थी। वो आकर पत्रकारों को छेड़ते हुए ये अक्सर कह जाते थे कि आपलोग ज्यादा मसालेदार न्यूज मत ढूंढों वरना मैं श्रीसंत को प्रेस कांफ्रेस में भेज दूंगा!
ये सच है कि मीडिया का एक बड़ा हिस्सा धोनी से भीतर ही भीतर नाखुश रहता था। धोनी को ये बात बखूबी पता थी। वजह क्या थी? धोनी ने भारतीय क्रिकेट में ड्रेसिंग रूम की खबरों का निकलना बंद करा दिया। प्लेइंग इलेवन यानि अगले दिन मैच में कौन खेलेगा और कौन नहीं हमारे जैसे दर्जनों टीवी पत्रकारों के लिए ब्रेकिंग और बिग एक्सक्लूसिव हुआ करती थी, लेकिन धोनी ने इस क्लचर को खत्म कर दिया। टीम मीटिंग की एक बात भी इधर से उधर होनी बंद हो गई क्योंकि टीम मीटिंग ही लगभग कम हो गई।
प्लेइंग इलेवन का एलान धोनी बस में स्टेडियम जाने के दौरान करते! अपना पहला मैच खेलने वाले कई खिलाड़ी इस दौर में अपने घरवालों को भी फोन नहीं कर सकते थे कि वो आज मैच खेलने वाले हैं! वेस्टइंडीज के खिलाफ वन-डे सीरीज जीतने के बाद ट्रॉफी अगर सबसे पहले अपना पहला मैच खेल रहे नवदीप सैनी को थमाई गई तो इसकी वजह भी धोनी ही हैं। धोनी ने ही भारतीय क्रिकेट में ये कल्चर लाया कि सबसे युवा खिलाड़ी को सबसे ज्यादा हाईलाइट मिले। मौजूदा टीम उसी परंपरा को बरकरार रख रही है।
एमएस धोनी और मोहिंदर अमरनाथ
- फोटो : ट्विटर
मौजूदा भारतीय टीम को देखें तो लगभग हर खिलाड़ी धोनी का कर्जदार है। एक कप्तान के तौर पर धोनी ने कैसे हर किसी का हौसला बढ़ाया और उन्हें वो मौके दिए जो शायद कोई भी चयनकर्ता नहीं देता। आज रोहित शर्मा ओपनर के तौर पर 2019 में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले खिलाड़ी बने हैं, लेकिन उन्हें ओपनर बनाया किसने? धोनी ने। और वो भी तब श्रीलंका के खिलाफ वन-डे सीरीज में मिडिल ऑर्डर में बुरी तरह से फ्लॉप होने के बाद रोहित को टीम में भी जगह नहीं मिलनी थी।
आज भी मोहिंदर अमरनाथ अक्सर इस बात को लेकर धोनी की खिंचाई करते हैं कि उनका चयनकर्ता का पद इसलिए छिन गया क्योंकि वो 2011 में धोनी को कप्तानी से हटाना चाहते थे। लेकिन, अमरनाथ कभी किसी को ये नहीं बतातें हैं कि उसी दौर पर वो विराट कोहली को शुरुआती टेस्ट मैचों में नाकाम होने के बाद प्लेइंग इलेवन से बाहर करना चाहते थे। धोनी अड़ गए और वो इसलिए कि उनकी दलील थी कि अगले दौरे पर यही कोहली आएगा ना कि तेंदुलकर-द्रविड़-लक्ष्मण। अगर बाहर करना है तो इन तीनों में से किसी एक को करें। जाहिर सी बात है कि अमरनाथ ये कभी नहीं कर सकते थे।
एम एस धोनी-सचिन तेंदुलकर
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तेंदुलकर से ज्यादा सम्मान धोनी ने शायद किसी भी क्रिकेटर का नहीं किया। मगर, जब टीम हित की बात आती तो वो अंध-भक्ति से दूर रहे। 2013 में साउथ अफ्रीका दौरे से के लिए धोनी की रणनीति साफ थी। वो जानते थे कि उम्रदराज तेंदुलकर उस योजना में अब टेस्ट क्रिकेट में फिट नहीं बैठतें हैं। तेंदुलकर को इशारों ही इशारों में ये बात पहुंचाई गई, लेकिन तब भी जब वो नहीं माने तो मजबूरन में आनन- फानन में उनकी विदाई सीरीज तय कराई गई। आज धोनी की सबसे बड़ी आलोचना इसी बात को लेकर होती है कि क्या 2011 वाला कप्तान धोनी 2019 वाले धोनी को अपनी टीम में चुनता? आसान जवाब है बिल्कुल नहीं। लेकिन, ये सवाल न तो आसान है और ना इसका जवाब।
कोहली तो कभी नहीं कहेंगे कि बस अब धोनी की जरूरत नहीं। कोच रवि शास्त्री का भी यही नजरिया है। लेकिन, बीसीसीआई अध्यक्ष सौरव गांगुली ऐसी बातों से इत्तेफाक नहीं रखेंगे। धोनी के क्रिकेट करियर का सबसे मुश्किल फैसला जनवरी 2020 में आएगा। धोनी को ये फैसला लेना होगा कि क्या वो भारतीय क्रिकेट में टी-20 वर्ल्ड कप तक प्रासंगिक बने रहना चाहतें है या फिर उन्होंने भी अब विदाई का मन बना लिया है। धोनी के बारे में कोई भी भविष्याणी करना खतरे से खाली नहीं है, लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि उनकी विदाई का अंदाज कुछ ऐसा होगा कि जिसके बारें में शायद ही कोई अंदाजा लगा पाए और अगर वो ऐसा फैसला करने में चूके तो गांगुली निश्चित तौर पर नहीं चूकेंगे। आपको याद है न गांगुली की विदाई किसने और कैसे करवाई थी!
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