भारत के लिए एक हॉकी विश्व कप में सबसे ज्यादा 12 गोल करने का गौरव अपने जमाने के बेहतरीन पेनल्टी कॉर्नर पर विशेषज्ञ रहे राजिंदर सिंह सीनियर को हासिल है। भारत अब तीसरी बार हॉकी विश्व कप की मेजबानी करेगा। भारत ने सबसे पहले 1982 बॉम्बे (अब मुंबई) और फिर 2010 में नई दिल्ली में हॉकी विश्व कप की मेजबानी की थी। 1975 में क्वालालंपुर में विश्व कप जीतने के बाद भारत का बॉम्बे विश्व कप के साथ 2000 में सिडनी में हॉकी विश्व कप में पांचवां स्थान पाना उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है।
1975 में हॉकी विश्व कप मे खिताब जीतने के बाद भारत के पदक को तरस जाने और ओडिशा में 28 नवंबर से शुरू हो रहे हॉकी विश्व कप में उसकी संभावनाओं की बाबत राजिंदर सिंह सीनियर से अमर उजाला ने खास बात की। राजिंदर सिंह सीनियर कहते हैं, 'भारत की मौजूदा हॉकी टीम खासी युवा है। भारतीय टीम के सामने ओडिशा में हॉकी विश्व कप में पदक जीत कर खुद को साबित करने की चुनौती है। भारतीय टीम सब कुछ भुलाकर अपना सर्वश्रेष्ठ देने पर ध्यान लगाए तो वह इस बार घर में पदक जीतने में जरूर कामयाब होगी।'
उन्होंने कहा, 'आज दुनिया की शीर्ष टीमों में कोई भी टीम किसी दूसरी टीम को हरा कर सकती है। आज दिन विशेष और टूर्नामेंट में जो भी मेच दर मैच अच्छा प्रदर्शन करेगी, खिताब वही जीतेगी। भारतीय हॉकी टीम अपने दर्शकों के सामने खेलेगी। भारत के पास गंवाने को कुछ नहीं है। भारत की नौजवान खिलाडिय़ों से सज्जित टीम ओडिशा हॉकी विश्व कप में अपनी क्षमता के मुताबिक खेली और दिन विशेष उसका प्रदर्शन अच्छा रहा तो वह जरूर इस बार घर में पदक जीतेगी।'
वह कहते हैं, ' भारत की मौजूदा हॉकी में हालांकि अनुभव और परिपक्वता की कमी दिखती है। सरदार सिंह का हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय हॉकी को अलविदा कहना और चोट के कारण एस वी सुनील और रमणदीप सिंह कर उपलब्ध नहीं रहना ओडिशा हाकी विश्व कप में भारत को अखरेगा। ये सभी अनुभवी खिलाड़ी इस बार विश्व कप के लिए भारतीय टीम में रहते तो अच्छा होता। विश्व कप के लिए जिस जोश और अनुभव की जरूरत होती है वह इस बार विश्व कप में शिरकत करने जा रही भारतीय टीम में कम दिखाई देता है।'
rajinder singh sr.
राजिंदर सिंह कहते हैं, 'भारतीय हॉकी खिलाड़ी बराबर शिविर में रहते हैं। उन पर उनकी क्षमता से ज्यादा दबाव रहता है। खिलाड़ी पर उसकी क्षमता के मुताबिक ही दबाव डालना जाना चाहिए। इस तरह के ज्यादा दबाव में अक्सर खिलाड़ी चोट खाकर बाहर हो जाते हैं। भारतीय हॉकी टीम को विश्व कप की तैयारी के लिए हर तरह की बेहतरीन सुविधाएं मिली है। भारतीय टीम को खुद को तैयार करने के लिए पर्याप्त एक्सपोजर मिला है। हर तरह की बेहतरीन ट्रेनिंग और खान-पान की उसके लिए बराबर व्यवस्था हुई।'
'अंतर्राष्ट्रीय हॉकी संघ (एफआईएच) के अध्यक्ष भी भारतीय हैं। अब तो हॉकी में रोलिंग सब्सिटयूशन का जमाना है और यह भारत के लिए खासे फायदे का सौदा है। अंतर्राष्ट्रीय हॉकी में आज दुनिया भर की टीमें तकनीकी और रणनीतिक रूप से उतनी मजबूत नहीं है जितने हमारे दौर में हुआ करती थीं। ऑस्ट्रेलिया , अर्जेंटीना, बेल्जियम, जर्मनी, इंग्लैंड और भारत जैसी हॉकी की दुनिया की शीर्ष टीमों में ताकत के लिहाज से अंतर बहुत कम हुआ है। हकीकत यही है जीत में कौशल के साथ किस्मत का रोल भी होता है।'
1982 में टीम अच्छी थी, किस्मत और अंपायरिंग खिलाफ रही
'हमारी 1982 के बॉम्बे विश्व कप में स्वर्गीय सुरजीत सिंह की कप्तानी में खेलने वाली भारतीय हॉकी टीम तब की बेहतरीन टीम थी। हमारी टीम में मोहम्मद शाहिद, मेरविन फर्नांडीज ,जफर इकबाल जैसे बेहतरीन फॉरवर्ड, रविंदर पाल सिंह, एम एम सौमाया जैसे मिडफील्डर थे। बतौर फुलबैक मैं और कप्तान स्वर्गीय सुरजीत सिंह तो थे ही अशोक दीवान जैसा मुस्तैद गोलरक्षक था।
कुल मिलाकर तब की हमारी टीम बेहतरीन टीम थी। मैंने तब विश्व कप जीतने वाली पाकिस्तान टीम के लिए सबसे ज्यादा गोल करने वाले हसन सरदार (दस गोल) को पीछे छोड़ दिया था। हम सेमीफाइनल के बहुत करीब थे, लेकिन गोल अंतर में पिछड़ कर इससे महरूम रह गए थे। मैं बस यही कहूंगा घटिया अंपायरिंग और किस्मत ने हमें तब घर में हॉकी विश्व कप में पहली बार मेडल जीतने से महरूम कर दिया।'