हॉकी से मेरा रोमांस मोहम्मद शाहिद को खेलते देखने के बाद शुरू हुआ था। 1980 में भारत को कुआलालम्पुर में हुई चार देशों की हॉकी प्रतियोगिता भारत को जितवाने के बाद ही शाहिद का नाम पहली बार लोगों की जुबान पर आया था।
वहां जब उन्होंने पाकिस्तान के सेंटर हाफ अख्तर रसूल को डॉज देते हुए गेंद आगे बढ़ाई थी तो उन्होंने पलट कर भारतीय बैक सुरजीत सिंह से पूछा था कि 'ये किस ककड़ी को पकड़ कर ले आए हो?'
1980 के मास्को ओलंपिक में फाइनल में शाहिद का रिवर्स फ्लिक याद करिए जिसने स्पेन के गोलकीपर को हिलने तक का मौका नहीं दिया था। उस टीम के कप्तान भास्करन कहते हैं कि शाहिद बॉडी फेंट कर रक्षकों को बीट करते थे।
ये एक ऐसी कला थी जो जन्मजात आती थी, सिखाई नहीं जा सकती थी। अस्सी के दशक में लोग हॉकी देखने नहीं मोहम्मद शाहिद को देखने जाते थे। दुनिया के बेहतरीन रक्षको को वो इस तरह भेदते थे जैसे किसान गेंहूं की फसल को अपनी हंसिया से भेदता है।
दोनों पैरों के बीच से गेंद डालकर दोबारा अपने पास खींच लेते थे
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जफर इकबाल बताते हैं कि मास्को में स्पेन के साथ लीग मैच में स्पेन के रक्षकों ने भारतीय खिलाड़ियों की इस तरह मैन टु मैन मार्किंग कर रखी थी कि किसी फारवर्ड को गेंद आगे ले जाने का मौका नहीं मिल पा रहा था। शाहिद ने अपनी ड्रिबलिंग के बल पर हुआन अमात जैसे बैक को छकाते हुए भारत के लिए मौके बनाए थे।
शाहिद ने अपनी ड्रिबलिंग का बेहतरीन नमूना पाकिस्तान के महान सेंटर फारवर्ड हसन सरदार के ख़िलाफ 1986 की भारत पाकिस्तान श्रंखला के दौरान भी दिखाया था। उन्होंने सरदार के दोनों पैरों के बीच से गेंद डालकर दोबारा अपने पास खींच ली थी। ऐसा उन्होंने एक बार नहीं बल्कि दो बार किया था।
शाहिद के साथ हॉकी खेल चुके सोमय्या याद करते हैं कि 1982 के विश्व कप के दौरान हालैंड के चार खिलाड़ियों टीस क्रूज, पॉल लिजेंस और दो अन्य खिलाड़ियों ने शाहिद को 4 फ़ुट बाई 4 फ़ुट के क्षेत्र में घेर रखा था। वो देखने लायक दृश्य था जब शाहिद अपने स्टिक वर्क के बूते पर इन सब विश्व स्तर के खिलाड़ियों से गेंद छीन कर आग बढ़ निकले थे।
ओलंपिक की सबसे अच्छी याद यह थी शाहिद की
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मैंने एक बार शाहिद से पूछा था कि 1980 के मास्को ओलंपिक की सबसे अच्छी याद क्या है ? उनका जवाब था कि जब हम मास्को से पहले दिल्ली और फिर ट्रेन से अपने शहर बनारस पहुंचे तो हजारों लोग हमें स्टेशन पर लेने आए हुए थे।
शहर में रोज हमारे सम्मान में समारोह हो रहे थे। हम जहाँ भी जाते थे लोग कहते थे भाषण दीजिए। मुझ जैसे 18-19 साल के लड़के के लिए ये गोल करने से भी ज्यादा मुश्किल काम हुआ करता था और हम सोचते थे कि किस मुश्किल में फंस गए।
अपने पीक पर शाहिद का जलवा ये होता था कि कोई भी रक्षक उनके सामने नहीं पड़ना चाहता था। जब शाहिद के पास गेंद नहीं होती थी तो कमेंटेटर्स की आवाज निकलनी बंद हो जाती थी। उस जमाने में मोहम्मद शाहिद ही हॉकी के पर्यायवाची थे।