यह इंचियोन में बिताए 16 दिनों की सुखद यादों को एक माला में पिरोने की अंतिम पहल थी। पदक जीतने की होड़ समाप्त हो चुकी थी और अब गले लगाने की बारी थी। मेन एशियाड स्टेडियम में हो रहे समापन समारोह का माहौल भी कुछ ऐसा बन पड़ा था।
मैदान की प्रतिद्वंद्विता भुलाकर खिलाड़ी मिल रहे थे। कोई झूम रहा था तो कई मस्ती में ढोल बजा रहे थे। जिन्होंने पदक जीते उनकी खुशी दोगुनी थी और जिन्होंने नहीं भी जीते वह भी अपना गम भुलाकर खुशी में सराबोर हो जाना चाह रहे थे।
यह वह मेला था जो दिलों को जोड़ने के संदेश के साथ शुरू हुआ था और यहां इस परंपरा को बखूबी निभाया भी जा रहा था। इसका सबसे बड़ा उदाहरण उत्तर कोरिया के दूसरे सबसे बड़े नेता ह्वांग प्योंग सो का अपने दो वरिष्ठ साथियों के साथ एशियाई खेलों के समापन समारोह में मौजूद होना था। उन्हें खास तौर पर समारोह में बुलाया गया और बेहद खराब संबंध होने के बावजूद उन्होंने इसमें शिरकत की।
उद्घाटन समारोह की तरह यहां भी इंचियोन अपनी हदों में रहा। समारोह में न कोई मिर्च थी न मसाला, न कोई तड़क थी और न ही कोई भड़क। यह पूरी तरह से कोरियाई पारंपरिकता में रचा बसा था, जिसमें इस देश के लोक नृत्यों के साथ रॉक और पॉप का भी तड़का था। उद्घाटन की तरह इस समारोह को भी कोरियाई आईडिया बैंक जांग ली ने तैयार किया था।
समारोह का विषय भी खेलों की सुखद यादें था। ताइक्वांडो का हेडक्वार्टर कुक्कीबान कोरिया में है और इसी के सदस्यों ने दांतों तले अंगुलियां दबाने वाली प्रस्तुति दी। खिलाड़ियों के पीछे खड़े सपोर्ट स्टाफ की खुुशियों और मेहनत और 16 दिनों के दौरान घटे रोमांचक क्षणों के वीडियों ने स्टेडियम में बैठे 61 हजार लोगों को खुश कर दिया। उन्हें खुशी इस बात की भी थी कि यह यादें उनके दिलों में हमेशा तरोताजा रहेंगी।
कोरियाई प्रधानमंत्री जुआंग हांग वान और उत्तर कोरियाई नेशनल डिफेंस कमीशन के चेयरमैन ह्वांग को एक साथ बैठे देखकर पूरा स्टेडियम फील गुड का अहसास कर रहा था। आंखों को चौंधिया देने वाली आतिशबाजी ने इस समारोह की चमक को दोगुना कर दिया। ...और अंत में इंचियोन ने मेजबानी का दारोमदार जकार्ता को सौंपते हुए अलविदा कहा।