30 वर्षीय सिराज अहमद के अनुसार 8 साल की उम्र में फिल्मों में फाइट के सीन देखे थे। तभी से कराटे सीखने का मन बना लिया। लेकिन परिजनों का डर और आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण सीख नहीं पाया। बकौल सिराज कई बार क्लब में जाकर कराटे सीखने की बात की, लेकिन महंगी फीस के कारण नहीं सीख पाया। पार्क में अभ्यास करने वाले राजू ने शुरू में कराटे की ट्रेनिंग देने शुरू की। एक दोस्त को साथ कराटे सीखने के लिए तैयार किया। दोस्त ने ड्रेस व फीस का बंदोबस्त किया। दोनों ने क्लब में सीखना शुरू किया। छह माह बाद क्लब बंद हो गया।
इसके बाद रामसहाय इंटर कॉलेज में अभ्यास किया। यहां प्रेक्टिस फीस 350 रुपये थी। जिसके लिए 300 रुपये माह की दो घंटे की नौकरी की। कठिन परिश्रम के कारण यदू होटल में हुई कराटे प्रतियोगिता में भाग लिया और स्वर्ण पदक जीता। 11 साल की उम्र में पदक ने टॉनिक का काम किया। कुछ समय बाद ब्रह्मपुरी स्थित संत विवेकानंद स्कूल में खुद बच्चों को सिखाना शुरू किया और अपनी फीस जमा करनी शुरू की।
सिराज के मुताबिक ब्रह्मपुरी निवासी अमित गुप्ता ने उनके कॅरियर में मदद की। उन्हें दूसरे खिलाड़ियों से मिलवाकर प्रैक्टिस कराई। उन्होंने दिल्ली उत्तराखंड, पंजाब, मुंबई, गुरुग्राम में आयोजित कई प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया है। सिराज अहमद कई स्कूलों में कराटे सिखा चुके हैं। वर्तमान में वह सेंट जोंस में कोच हैं।
साल 2001 में मेरठ के कैलाश प्रकाश स्टेडियम में हुई प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक प्राप्त किया। साल 2004 में हुई नेशनल कराटे चैंपियनशिप मद्रास में स्वर्ण पदक जीता इसके अलावा 2006 में गाजियाबाद में आयोजित की गई नेशनल प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक हासिल किया। यही नहीं वह साउथ एशिया चैंपियनशिप में रजत पदक और 2007- नेशनल चैंपियनशिप अंधेरी स्पोर्ट्स क्लब मुंबई में स्वर्ण पदक हासिल कर चुके हैं। इसके अलावा भी सिराज ने कई प्रतियोगिताओं में रजत, कांस्य पदक जीते हैं।