बैडमिंटन का खेल रफ्तार के लिए जाना जाता है, जिसमें एक पल की चूक शटलर के साथ-साथ उसके देश को भारी पड़ जाती है। इसमें स्फूर्ति और ऊर्जा हमेशा उच्चस्तर की लगती है। भारत में प्रकाश पादुकोण ने ऑल इंग्लैंड चैंपियनशिप जीतकर बैडमिंटन का प्रचलन बढ़ाया, फिर पुलेला गोपीचंद ने इसे नया आयाम दिया। मगर अब देश में बैडमिंटन की पहचान पुरुष से ज्यादा महिलाओं की बदौलत है। इसका प्रमुख कारण है साइना नेहवाल का उदय, जिन्होंने देश में बैडमिंटन की सूरत ही बदलकर रख दी।
नेहवाल ने विश्व जगत में बैडमिंटन में सबसे मजबूत चीन के खिलाड़ियों को मात देकर अपना लोहा मनवाया। आज वो दौर है जब साइना युवा शटलरों की प्रेरणा बन चुकी है। इसे देखते हुए स्पष्ट है कि साइना किसी परिचय की मोहताज नहीं है। खेल जगत में साइना के योगदान को बिना सैल्यूट किये नहीं रहा जा सकता।
साइना नेहवाल ने 2008 में पुणे में हुई वर्ल्ड जूनियर चैंपियनशिप जीती। वो इनकी पहली उपलब्धि थी और वो इसे हासिल करने वाली पहली भारतीय महिला भी बनी। शीर्ष वरीय साइना ने जापान की सायका साटो को सीधे सेटों में 21-9, 21-18 से हराकर मुकाबला जीता। नेहवाल ने सिर्फ 25 मिनट में इस मुकाबले को अपने नाम किया। यही से साइना के स्वर्णिम सफ़र की शुरुआत हुई थी।