आख़िर लोगो को धर्म गुरु या आध्यात्मिक गुरु की जरूरत क्या है? यह सवाल सैंकड़ों साल से मनुष्य के मन में कौंधता रहा है।
इन दिनों तो और ज्यादा व्यथित कर रहा है यह सवाल क्योंकि एक के बाद कई धर्मगुरुओं की असलियत सामनें आई है, जिससे लोगों की श्रद्धाभावना को आघात लगा है। प्रसिद्ध धर्मविज्ञानी योगी निरंजन के अनुसार कुछ लोग धर्मगुरु की मर्यादा से गिरे हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि तमाम गुरु इसी स्तर के होंगे।
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उन्होंने गुरु का चुनाव करने के लिए कुछ शास्त्रीय मर्यादाओं का भी जिक्र किया है। साथ ही यह भी कहा है कि समस्या किसी गुरु का पथभ्रष्ट होना नहीं है। समस्या चुनाव करते समय शिष्य का गड़बड़ा जाना है।
शास्त्रों और सामाजिक स्थितियों का अध्ययन करने के बाद योगी निरंजन का कहना है कि धंधे के तौर पर बाबाबाजी करने वाले गुरु लोग तो अपना फन दिखाते ही हैं, शिष्य भी किसी आध्यात्मिक लक्ष्य के बजाए अपना दुनियावी मकसद ले कर गुरु की खोज में निकलते हैं और इस खोजयात्रा में ही फंस कर रह जाते हैं।
पूजने के लिए वैसे भी देवी देवताओं और भगवानों की कमी नहीं है। पर उनसे प्रत्यक्ष संवाद नहीं हो पाता। क्योंकि पूजा पाठ और आराधना मन और आत्मा के स्तर को ऊंचा उठाती है। इस क्षेत्र में ठगने या ठगे जाने की कोई गुंजाइश नहीं है।
लेकिन जैसे ही किसी को गुरु मानकर उसे भगवान का दर्जा देने की ओर बढ़ते हैं अपेक्षा और विश्वास बदल कर एकांगी सेवा और अंधविश्वास के दलदल में धंसने लगता है। गुरु भले ही बहुत ज्ञानी और धर्मात्मा हो आखिर होता तो इंसान ही है। इंसान है तो उसके अपने स्तर और स्थिति से डिगने की भी पूरी संभावना रहती है।
इन खतरों से बचाव का उपाय किसी गुरु के बजाय सरु की शरण में जाना है। वह सद्गुरु अपने भीतर ही मौजूद है। बेशक समाज में अच्छे और सच्चे गुरुओं की कमी नहीं। पर सवाल अपने भीतर बैठे सद्गुरु का है जो बाहर के गुरु को प्रमाणित करता है। उस सदगुरु को जगा लिया तो धर्मगुरु जैसे दिखने वाले लोग शिक्षक या उपदेशक से ज्यादा कुछ नहीं है।