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जल का भंडार समुद्र नहीं आकाश है

Tue, 11 Jun 2013 10:56 AM IST
ज्योतिर्मय
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प्रकट तौर पर लगता तो यही है कि पानी समुद्र या उसके अंग अवयव नदी तालाब और झरनों या जमी हुई बर्फ के पिघलने से आता है। इसलिए धरती पर जल की कमी कभी आ ही नहीं सकती। कठिनाई या समस्या उसके प्रबंधन या वितरण को लेकर ही हो सकती है। वर्षा का स्रोत आकाश को मानने वाले विज्ञानियों की कमी भी नहीं है।
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उसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे स्वयंसेवी संगठन वारुणि के संयोजक एस नारायणन के अनुसार जल का स्रोत आसमान में है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि दुनिया एक यज्ञ की तरह है। आकाश से बरसा हुआ जल एक चक्रीय गति से वापस आकाश में पहुंच जाता है। समुद्र और नदी नालों में उसका संग्रह भर दिखाई देता है। अन्यथा उसका मूल रूप तो आकाश में ही होता है।

नारायणन के अनुसार आकाश में स्थित जल को पृथ्वी पर उगे हुए वृक्ष वनस्पति आकर्षित करते और बरसने की भूमिका बनाते हैं। इस बात को मौसम विज्ञानी और भू-शास्त्री भी मानने लगे हैं कि वृक्ष वनस्पति नष्ट होने या कम होते जाने के बाद ही वर्षा भी कम होती गई है। जंगल नष्ट हो रहे हैं तो बादलों का गर्जन तर्जन भी कम होता जा रहा है।
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वेद शास्त्रों का हवाला देकर महर्षि वेद विज्ञान के वरिष्ठ अधिकारी डॉ राम प्रसाद का कहना है कि जल के देवता वरुण का निवास आकाश में माना गया है। अगर समुद्र जनसंसाधन का प्रमुख श्रोत होता तो उसे वरुण का निवास माना जाता। वह जल का अगाध भंडार जरूर है, जिसके अधिपति विष्णु हैं।

लेकिन नियामक तो वरुण देव ही हैं। जिन इलाकों में वर्षा नहीं हो रही होती वहां यज्ञ अनुष्ठान किए जाते हैं। अनावृष्टि और अकाल आदि संकटों का निवारण यज्ञ से करने वाले विद्वान पुरोहित आज भी मिलते है। महर्षिवेद विज्ञान के आचार्य सूर्यकांत द्विवेदी के अनुसार यज्ञ अनुष्ठान मे किए जाने वाले औषधि प्रयोग आकाश में स्थित जलकणों को वृष्टि में बदलते है और थोड़ी ही देर में वर्षो होने लगती है।

लेकिन यह व्यवस्था उपचार जैसी है, जिसे नियमित जीवन में नहीं अपनाया जा सकता। उदाहरण दे कर उन्होंने कहा कि बीमार होने पर स्वास्थ्य लाभ के लिए दवाएं ली जाती है। उनसे रोग ठीक भी हो सकता है पर स्वस्थ रहने के लिए अपने रहन सहन को व्यवस्थित और अनुशासित रखना पड़ता है। वर्षा को नियमित रखने के लिए भी उसी तरह प्रकृति संतुलन जरूरी है।
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