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इसलिए संयासी गेरुआ वस्त्र धारण करते हैं

Thu, 16 Jun 2016 10:44 AM IST
ओशो/अध्यात्मिक गुरु
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साधु
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परमात्मा बहुत रूपों में तुम्हारे पास आता है, मगर तुम पहचान नहीं पाते--कच्चे भांडै! उसकी वर्षा होती है, तुम्हारे लिए दुर्भाग्य की घड़ी आ जाती है। पको! कैसे पकोगे? अग्नि से गुजरना होगा। इसलिए सदियों-सदियों में संन्यास का जो रंग चुना गया--गैरिक--उसका कारण इतना ही था, वह अग्नि का रंग है। अग्नि से गुजरना होगा, साधना से गुजरना होगा, तो सधोगे, तो पकोगे।
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सत्संग में पुकार सुनी जाती है। साधना में पुकार को प्रयोग दिया जाता है। सत्संग में बात जम जाती है, साधना में उस जीवन को रूपांतरित किया जाता है। साधना तुम्हारे भीतर कच्चे घड़े को पकाने का उपाय है। घटि घटि गोरख कहै कहाणी। कांचै भांडै रहै न पाणी।

गोरख कहते हैंः मैं तो पुकारता हूं, मैं तो बरस उठता हूं। मगर कच्चे घड़े हैं, उनमें पानी टिकता नहीं। वे तो उल्टे नाराज हो जाते हैं। कच्चा घड़ा तो नाराज हो ही जायेगा। उसकी तो जिंदगी खराब हो गयी। उस पर तो वर्षा क्या हो गयी, वह तो मिट गया। वर्षा सौभाग्य नहीं बनी, दुर्भाग्य हो गयी। कच्चा घड़ा तो वर्षा से डरेगा। लेकिन जो घड़ा वर्षा से डरेगा, वह भरेगा कैसे? कच्चा घड़ा कभी नहीं भर पायेगा, खाली का खाली रहा आयेगा।
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इसलिए तो अधिक लोगों की जिंदगी अर्थहीन है-- रिक्त, खाली...उसमें कोई रसधार नहीं बहती। ऐसा भी नहीं लगता कि क्यों हम जी रहे हैं, किसलिए? क्या प्रयोजन है? न होते तो क्या हर्ज था? हुए तो लाभ क्या? लोग जी लेते हैं, ढो लेते हैं जीवन के बोझ को। लेकिन इस जीवन में कोई नृत्य-गीत-उत्सव नहीं होता। और जहां नृत्य नहीं, उत्सव नहीं, गीत नहीं, वहां परमात्मा के प्रति धन्यवाद का तो सवाल कैसे उठेगा? धन्यवाद तो केवल वे ही दे सकते हैं जो धन्यभागी हैं। और धन्यवाद ही प्रार्थना है और धन्यवाद ही पूजा है।
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