अमेरिकी नागरिकों में, खासतौर
पर बड़ी उम्र के लोगों में यह विश्वास तेजी से जोर पकडऩे लगा है कि रोग शोक से बचने
के लिए दवा दारू ही काफी नहीं है। इसके लिए प्रार्थना का उपाय भी किया जाना चाहिए।
साथ ही यह भी कि सामूहिक प्रार्थना की बजाय एकान्त में ईश्वर से निवेदन किया जाय तो
वह ज्यादा कारगर होगा।
मनोविज्ञान और उस आधार पर स्वास्थ्य, व्यवहार आदि
विषयों पर कार्य कर रहे विज्ञानियों की संस्था अमेरिकन साइकोलॉजी एसोसिएशन (एपीए)
ने 2002 से 2009 तक के आँकड़ों का अध्ययन करने के बाद यह बात कही है। संस्थान के
मुखपत्र एपीए जर्नल ऑफ साइकोलॉजी रिलीजन एण्ड स्पिरिचुअलिटी के मई 2011 अंक में
प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार यह प्रवृत्ति इस शताब्दी के शुरूआत में तेजी से बढ़ती
दिखाई दी।
रिपोर्ट के अनुसार पुरुषों की तुलना में महिलाएं प्रार्थना का
आश्रय ज्यादा ले रही हैं। प्रतिशत के हिसाब से देखें तो पांच साल में इनकी संख्या
51 से बढ़कर 56 प्रतिशत हो गई। पुरुषों में यह अनुपात 46 से बढ़कर 49 प्रतिशत ही
गया। प्रार्थना और धर्मग्रन्थों के पाठ करने वालों की संख्या 18 वर्ष से ज्यादा
उम्र के लोगों में बढ़ती देखी गयी।
एपीए ने इस अध्ययन में लगभग सभी सदस्यों
से आंकड़े एकत्रित कराये थे। वाशिंगटन स्थित मुख्यालय में एपीए के डेढ़ लाख सदस्यों
द्वारा भेजी गयी जानकारी को खंगाला गया। उस विश्लेषण से नतीजे सामने आये कि दस साल
में चिकित्सा और ज्यादा आधुनिक हुई, बाजार में 18 प्रतिशत नयी दवाएं आयी जो जटिल
रोगों में उपचार में काम आती हैं।
लोग इन्हें अपनाते भी हैं, फिर भी
प्रार्थना पर आश्चर्यजनक रूप से विश्वास बढ़ा है। कोई कारण समझ नहीं आ रहा कि लोग
चिकित्सा के अलावा प्रार्थना और ध्यान का आश्रय लेना भी क्यों पसन्द कर रहे हैं।
संस्थान के कुछ सदस्यों ने राय जतायी कि समाज में बढ़ता अकेलापन लोगों को ईश्वर की
शरण में जाने के लिए ज्यादा प्रेरित कर रहा है।
वहीं दूसरी ओर मनोविज्ञानी
डेसमण्ड ग्रीड का कहना है कि इस बीच लोगों की औसत आयु भी तो बढ़ी है। समाज व्यवस्था
और प्रशासन तन्त्र भी पहले से अधिक आश्वस्त करने वाला बना है। उस स्थिति में
प्रार्थना के प्रति बढ़ते हुए विश्वास के कारण कुछ और ही होना चाहिए।