कबीर (1440 से 1518 तक) सब संतन सरताज के रुप में जाने जाते है। जिस तरह संत कबीर के बिना सभी संतों का कोई मूल्य नहीं उसी तरह कबीरचौरा मठ मुलगड़ी के बिना मानवता का इतिहास मूल्यहीन है। कबीरचौरा मठ मुलगड़ी की अपनी समृद्ध परंपरा, इतिहास है। ये सभी संतों के लिए भी अनूठा विद्यापीठ है। मध्यकालीन भारत के भारतीय संतों में ज्यादातर ने यहीं धार्मिक और आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त की थी।
मानव परंपरा के इतिहास में ये साबित हुआ है कि गहरे चिंतन के लिए हिमालय पर जाना जरुरी नहीं है बल्कि इसे समाज में रहते हुए भी किया जा सकता है। कबीर दास खुद इस बात के आदर्श संकेत थे। निर्गुण भक्ति का प्रचार करने के साथ उन्होंने आम लोगों की तरह साधारण जीवन जीया। पत्थर को पूजने के बजाय उन्होंने लोगों को स्वतंत्र भक्ति का रास्ता दिखाया।
कबीर और दूसरे संतों के जरिए उनकी परंपरा के इस्तेमाल किए गए वस्तुओं को आज भी कबीर मठ में सुरक्षित तरीके से रखा गया है। सिलाई मशीन, खड़ाऊ, रुद्राक्ष की माला, जंग रहित त्रिशूल और इस्तेमाल की गई दूसरी सभी चीजें अब भी कबीर मठ में उपलब्ध है।