कुदरत ने
अपने कई रहस्य उजागर किए हैं।
आए दिन वह नये-नये
रहस्यों का उद्घाटन करती भी
है। इस तेजी से कि लगता है जल्दी
ही उसके रहस्यों का खजाना खाली
हो जाएगा। लेकिन यह भी उतना
ही सच है कि जगत को पूरी तरह
जान सकना कभी सम्भव न हो सकेगा।क्योंकि
उसके विस्तार की तुलना में
मानवी बुद्धि की एक सीमा और
मर्यादा है। इसके कई उदाहरण
हैं जैसे आंख से न दीख सकने
वाले एक जीव माइक्रोव केवल
लम्बाई-चौड़ाई की
दो दिशाओं का ही ज्ञान है।
ऊंचाई से
वह परिचित नहीं है। उसे समतल
फर्श पर रखा जाय तो वह चलता ही
रहेगा किन्तु आगे कोई तख्ती
खड़ी रख दी जाय तो रुक जायेगा।
उस बाधा से बचने या आगे बढऩे
का कोई उपाय नही करेगा।अगर उसमें
बुद्धि रही होती तो वह सोचता
और दावे के साथ कहता कि लंबाई
चौड़ाई के अलावा ऊंचाई का कोई
आयाम नहीं होता।
कर्मफल न
चाहते हुए भी मिलते हैं। कोई
नहीं चाहता कि उसे गलत कामों
के लिए दंड मिले। पर यह इच्छा
कहां पूरी होती है? नियामक
शक्ति जिसे ईश्वरीय विधान भी
कह सकते हैं- के
जरिए प्राणियों पर भी अंकुश
रहता है। जैसे ही वे आलस्य-प्रमाद
बरतते हैं उन्हें नाकामी झेलना
पड़ती है।
इसकी वजह बताते हुए
वैज्ञानिकि और दार्शनिक हिचकाक
ने लिखा है जीवन की प्रत्येक
ईकाई में चेतना के सूक्ष्म
स्तर पर ऐसी व्यवस्था आयोजित
है कि वह बुरे या नियति से
विपरीत कामों का दंड अपने आप
ही चुनाव कर लेती है। आज के
कर्मों का फल कल मिले इसमें
देरी तो हो सकती है किंतु कुछ
भी करते रहने और मन चाहे प्रतिफल
पाने की छूट किसी को भी नहीं
है।
हांलाकि सभी सुविधानजक
स्थिति में स्थिर रहना चाहते
हैं, पर इसमें किसी
की मर्जी नही चलती। इस व्यवस्था
प्रवाह को ईश्वर समझा जा सकता
है। अंत:करण में एक
ऐसी शक्ति काम करती है जो
सन्मार्ग पर चलने से प्रसन्न,
संतुष्ट हुई दिखाई
पड़ती है और कुपथ पर चलें तो
खिन्नता या उद्विग्नता अनुभव
करती है।