भगवदगीता और दूसरे धर्मग्रंथों के अनुसार यह शरीर या दुनिया यज्ञ की उत्पत्ति है। उससे बचा हुआ अन्न ही संसार का आहार बनता है। इस आध्यात्मिक सत्य को विज्ञान भी प्रमाणित करने लगा है। भौतिक विज्ञान ने यज्ञ की पारंपरिक धारणा को बिग बैंग(आरम्भिक महान विस्फोट द्वारा इस ब्रह्माण्ड का सृजन) सिद्धांत से व्यक्त किया है।
इस सिद्धान्त के अनुसार आरम्भ में केवल ऊर्जा थी जिसमें कोई भयंकर विस्फोट हुआ और उससे सारी ऊर्जा द्रव्य के रूप में घनीभूत हो गई। विस्फोट क्यों हुआ, यह किसी को पता नहीं है। अग्निहोत्र कर्म काण्ड प्रतिदिन सुबह और शाम के समय होता है। अध्यात्म में यह सुबह और शाम किस प्रकार होते हैं? दिन सूर्य है और रात्रि पृथ्वी।
सूर्य प्राणों का बृहत् रूप है जबकि पृथ्वी देह का, प्रतिदिन सोते समय प्राणों का अस्त हो जाता है। प्रसिद्ध वैदिक विद्वान डा. फतहसिंह के अनुसार वैदिक साहित्य में गति ज्ञान के अर्थ में भी आता है। उस ज्ञान या गति के अनुसार पृथ्वी अपना अन्न आदि का सूक्ष्म भाग चन्द्रमा में कृष्ण रूप में स्थापित करती है। सूर्य अपना अन्न आदि भाग पृथ्वी में ऊसर रूप में स्थापित करता है।
विज्ञान भी अब पुष्टि करने लगा है कि चंद्रमा की शीतल किरणें पृथ्वी पर रस का संचार करती हैं और सूर्य किरणें उन्हें परिपक्व बनाती हैं। संसार के उत्पन्न होने की बिग बैंग थ्योरी या महासिद्धांत को अग्निहोत्र के संदर्भ से जोड़ते हुए प्रसिद्ध कास्मोंलाजिस्ट एवी गोवान द्रव्य को घनीभूत करके द्रव्य को पुन: प्रकाशीय ऊर्जा में रूपान्तरित होने की बात करते हैं।
इसे वे भारतीय परंपरा में वाक् या पृथ्वी के घनीभूत होने में नाभिकीय विखण्डन की प्रक्रिया से जोड़ते हैं। जहां एक घटना दूसरी घटना को जन्म और जीवन देती है तथा यज्ञ की तरह एक दूसरे का पोषण करते हुए आगे बढ़ती जाती है। संसार चक्र इसी तरह चलता रहता है।