साल में दो बार नवरात्रि मानने का चलन बदल रहा है और इस बार आषाढ़ में गुप्त नवरा्त्रि के नाम से भी एक अनुष्ठान लोकप्रिय होता दिखाई दे रहा है। आषाढ़ की नवरात्रियां नई नहीं हैं। कहते हैं कि ईसा से तीसरी शताब्दी पहले भी इनका चलन था।
पर तब योगी यति और तंत्र मंत्र साधने वाले लोग ही इन दिनों तप अनुष्टान करते थे। लेकिन अब संचार और संपर्क की सुविधा के कारण इस अवसर का लाभ सभी उठाने लगे हैं। कालिका पीठ के आचार्य निरंजन पुरी का कहना है कि संचार और संपर्क की सुविधा नहीं, भीतर से खाली होते जा रहे मनुष्य की आध्यात्मिक जरूरते बढ़ रही है।
इसलिए आषाढ़ की नवरात्रियां भी लोकप्रिय हो रही हैं। अभी तो तीसरी नवरात्रि ही चलन में आई है। आगे पौष और माघ की नवरात्रियां भी प्रचलित होंगी। फिर हो सकता है कि हर महीने नवरात्रियां मनाई जाने लगें। समाज में बढ़ती आपाधापी और तनाव का अध्ययन करते हुए महंत निरंजन पुरी इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि शुक्ल पक्ष का चंद्रमा प्रतिपदा से नई ऊर्जा ग्रहण करने लगता है।
नवमी तक वह पर्याप्त बली हो जाता है। अपनी आध्यात्मिक गरिमा और साधना के उपयुक्त माहौल के कारण तो इस अवधि का महत्व है ही, व्यक्ति की अपनी मनस्थिति भी चंद्रमा की घटती बढ़ती कलाओं से प्रभावित होती है। सभी जानते हैं कि चंद्रमा के प्रकाश का आकार अमावस्या से पूर्णिमा तक बढ़ता है और पूनम के बाद अमावस तक घटता जाता है और तेरहवीं या चौदहवीं रात को वह बिलकुल नहीं दिखाई देता।
अमावस के बाद दूसरी रात को नया चांद दिखाई देता है। चौथी रात को पूरा प्रकाशित होता है। नवरात्र का सीधा संबंध चंद्रमा और मनुष्य के बीच तालमेंल से है। मनुष्य ही क्या जीव जंतु और प्रकृति के जड़ घटक तक चंद्रमा की इन कलाओं से प्रभावित होते हैं।
नवरात्रि अर्थात मौसम में आने वाले सामान्य उतार चढ़ाव के दिनों में चंद्रमा की बढ़ती हुई कलाओं के मौके का उपयोग मन को साधने के लिए किया जा सकता है। साधकों और इन उपायों से आगे तक गए सिद्ध पुरुषों की मानें तो अगले दिनों साल के प्रत्येक चांद्रमास में शुरु के दिनों में नवरात्र मनाए जा सकते हैं। महंत पुरी के अनुसार यह सोचना और कहना जल्दबाजी होगी कि बढ़ते मनोरोग या दुर्बलताएं देख कर चिकित्सक भी चंद्रमा की इन कलाओं का नवरात्र उपयोग करने की सलाह देने लगें।