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सीख: अपने करीबियों की समझे अहमियत

Wed, 16 May 2018 03:12 PM IST
संपादकीय डेस्क, अमर उजाला
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रोहित की मां उसका बहुत ख्याल रखती थीं। वह कुछ बोले, इससे पहली ही मां उसकी बात समझ जाती थीं। लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा होने लगा, उसके पास अपनी मां के लिए समय नहीं बचता। वह ज्यादातर समय अपने दोस्तों के साथ ही मसरूफ रहता था। लेकिन जितनी देर वह घर में रहता, मां उसके पीछे घूमा करतीं। कुछ अरसे बाद रोहित की शादी हो गई। रोहित की खुशी के लिए मां ने उसे एक नया घर लेकर अलग रहने को कहा। बेहतर सुझाव समझकर रोहित पत्नी के साथ नए घर में शिफ्ट हो गया। लेकिन रोहित के जाने के बाद भी उसकी मां का मन उसी में लगा रहता।

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वह दिन में कई बार उसे सिर्फ यह जानने के लिए फोन करतीं कि उसने क्या खाया, क्या किया, उसका दिन कैसा रहा। पर रोहित को ये सारे सवाल अब बेमतलब के लगने लगे थे। एक रात रोहित जब घर वापस लौट रहा था, तब उसकी कार एक सुनसान जगह पर खराब हो गई। उसने बहुत कोशिश की, पर उसे कोई मदद नहीं मिली। तभी एक बूढ़ी महिला कहीं से वहां आ पहुंची और उसने रोहित के लिए रात में ठहरने और खाने-पीने की व्यवस्था कर दी।

अगले दिन महिला ने एक मैकेनिक को फोन कर रोहित की कार ठीक करवा दी। रोहित ने वहां से चलते हुए महिला से कहा, आप बताइए, मैं आपके लिए क्या कर सकता हूं? महिला बोली, बस अपनी मां का ख्याल रखना। रोहित हैरान होकर उस महिला की तरफ देखने लगा। महिला बोली, एक मां के लिए उसकी औलाद से बढ़कर और कुछ नहीं होता। उसकी खुशी के लिए वह अपना सब कुछ न्योछावर कर देने के लिए तैयार होती है। मैंने बस वही किया, जो मैं अपने बेटे के साथ करती। लेकिन काश, मेरा बेटा यह समझ पाता। यह सुनकर रोहित की आंखों में आंसू थे। बचपन में मां के साथ गुजारे सारे पल उसकी आंखों के सामने से गुजर गए। वह लौटा और अपनी पत्नी को लेकर वापस मां के साथ रहने लगा।

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