गीता में स्पष्ट लिखा है कि समाज प्रसिद्ध व्यक्तियों के पदचिह्नों पर चलता है। एक समय था जब गुरु और शासक आदर्श पुरुष माने जाते थे। शासक गुरु के मार्गदर्शन में कार्य करते थे। समाज का और व्यक्ति का आध्यात्मिक उत्थान ही गुरु का उद्देश्य होता था।
शासक गुरु के निर्देश में जनता के लिए कार्य करता था और वानप्रस्थ का समय आने पर सब कुछ त्याग कर गुरु के आश्रम की ओर प्रस्थान करता था। यह पूरी तरह आदर्श समाज था; जिसे सतयुग भी कहा जाता है। इस दौर से अलग उत्तरजीवी त्रेता, द्वापर व कलियुग के आरंभ तक इस तरह के संस्कार जीवित रहे।
आज के आदर्श पुरुष फिल्म अभिनेता, राजनीतिज्ञ, प्रशासक, क्रिकेटर व कुछ कथित आध्यात्मिक गुरु ही रह गए हैं। इनमें से अधिकतर में एक समानता है कि वे भ्रष्ट तरीकों से धन इकट्ठा करने में व्यस्त हैं।
उनकी भड़कीली व खर्चीली जीवनशैली, आपराधिक पृष्ठभूमि व उनके विरुद्ध चल रहे मुकदमे, सदैव कैमरे के सामने दिखने की ललक, धन इकट्ठा करने की लालसा का मूल्य भोले भाले लोगों को चुकाना पड़ता हैं।
भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन करने अथवा व्यवस्था को बदलने की अपेक्षा अपने आस पास कम से कम एक व्यक्ति को बदलें व उसे किसी अन्य को बदलने के लिए प्रेरित करें। इस प्रकार से हम एक दिशा की ओर बढ़ेंगे। हमें इसके नतीजे भी मिल सकते हैं। लेकिन इसके लिए आपको सर्वप्रथम स्वयं को बदलना होगा।