ईसा मसीह एक बार पहाड़ की ओर दौड़े जा रहे थे। कुछ इस तरह, जैसे कोई शेर उन पर हमला करने आ रहा हो। एक आदमी उनके पीछे दौड़ा और इसका कारण पूछने लगा। ईसा जल्दी में थे, इसलिए उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। कुछ दूर तक वह आदमी पीछे-पीछे दौड़ा और आखिर पुकारने लगा। उसने कहा, मालिक के वास्ते जरा तो ठहरिए। आपकी इस भाग-दौड़ से मुझे बड़ी चिंता हो रही है। आप इस तरह क्यों भागे जा रहे हैं? आपके पीछे न शेर है, दुश्मन।
ईसा ने कहा, तुम सही कह रहे हो। परंतु मैं एक मूर्ख मनुष्य से भाग रहा हूं। उस व्यक्ति ने कहा, आप तो मसीहा हैं, जिनके चमत्कार से अंधे देखने लगते हैं और बहरों को सुनाई देने लगता है? वह बोले, हां। मैं ईश्वर का पुत्र हूं। उसने फिर कहा, क्या आपके पास ईश्वर की दी हुई ऐसी शक्ति नहीं है कि फूंक दें, तो मुर्दा भी जिंदा हो उठें? फिर आपको किस बात का डर है?
ईसा ने कहा, तुमने सही समझा। जिसकी महान शक्ति के मुकाबले में आकाश भी तुच्छ हैं, जब उसके पवित्र नाम को मैंने बहरों और अंधों पर पढ़ा, तो वे अच्छे हो गए, पहाड़ों पर चढ़ा, तो उनके टुकड़े-टुकड़े हो गए, मृत शरीरों पर पढ़ा, तो वे जीवित हो गए। लेकिन मैंने बड़ी श्रद्धा से वही पवित्र नाम जब मूर्खों पर पढ़ा और लाखों बार पढ़ा, तो अफसोस कि कोई लाभ नहीं हुआ।
उस आदमी ने आश्चर्य से पूछा कि हजरत, यह क्या बात है कि ईश्वर का नाम वहां काम करता है और यहां कोई असर नहीं करता? क्या कारण है कि उस सृष्टिकर्ता का पवित्र नाम दोनों पर समान असर नहीं करता? ईसा ने कहा, मूर्खता ईश्वर की ओर से दिया हुआ दंड है और अंधेपन की बीमारी दंड नहीं है। बीमारी से तो दया आती है, लेकिन मूर्खता वह रोग है, जिससे दिल में जलन होती है।