बोकुजु नाम का एक जेन साधु किसी गांव की गली से होकर गुजर रहा था। अचानक कोई उसके पास आया और उसने बोकुजु पर छड़ी से वार किया। साधु गिर पड़ा। उस आदमी की छड़ी भी उसके हाथ से छूट गई और वह भाग लिया। बोकुजु संभला, और गिरी हुई छड़ी उठाकर वह उस आदमी के पीछे पीछे कहते हुए भागा, रुको, अपनी छड़ी तो लेते जाओ!
बोकुजु उस आदमी तक पहुंच गया और उसे छड़ी सौंप दी। इस बीच यह सब देखते हुए लोग रुके और वहां भीड़ लग गई। लोगों को हैरानी हुई कि उस आदमी ने तो साधु पर वार किया था। उससे साधु चोटिल भी हुआ। पर उसने बदले में कुछ कहने के उसके पीछे दौड़ लगा दी। किसी ने बोकुजु से पूछा कि इस आदमी ने तुम्हें जोर से मारा, लेकिन तुमने उसे कुछ नहीं कहा?
बोकुजु ने कहा, हां, लेकिन वह एक अलग बात थी। उसने मुझे मारा, वह बात वहीं खत्म हो गई।यह ऐसा ही है, जैसे मैं किसी पेड़ के नीचे बैठा होऊं और उसकी एक डाली मुझ पर गिर जाए! तब मैं कर ही क्या सकता हूं?
भीड़ ने कहा, पेड़ की शाखा तो बेजान शाखा है, लेकिन यह तो एक आदमी है! हम पेड़ को भला-बुरा नहीं कह सकते, उसे दंड नहीं दे सकते। क्योंकि वह पेड़ ही है, वह सोच-विचार नहीं सकता। यह आदमी पेड़ की तरह है। किसी पेड़ से कुछ नहीं कहा जा सकता, तो इस आदमी से क्यों कहूं? जो हो गया, वह हो गया। अब उसके बारे में सोचकर चिंता क्या करना? वह हो गया, बात खत्म। मुझे तो अपना कर्तव्य करना चाहिए। मुझे ही क्यों, हर किसी को अपना धर्म निभाना चाहिए।
बोकुजु का मन एक संत का मन है। वह चुनाव नहीं करता, सवाल नहीं करता, जो कुछ भी होता है, उसे वह स्वीकार करता है। यह स्वीकार ही उसे मुक्त करता है।