हां यह संभव है कि हम फिर बच्चे जैसे हो जाएं और अपने आस-पास सकारात्मक उर्जा प्रसारित करें? इसका रहस्य हमारी अपनी सांस में है। सांस लेने की कुछ विशेष प्रक्रिया, प्राणायाम, थोड़ा ध्यान- इन सबसे हम अपने भीतर सकरात्मक उर्जा फिर से जगा सकते हैं। हम अपने शब्दों से अधिक अपनी मौजूदगी से व्यक्त करते हैं।
अगर हम क्रोध या तनाव में हों तो दूसरे लोग स्वतः हम से दूर रहते हैं। अब प्रश्न उठता है कि ये नकारात्मक स्पंदन हमारे शरीर के ऊर्जा क्षेत्र में कैसे आती हैं? जीवन में जो भी नकरात्मक अनुभव हम देखते या सुनते हैं, वे हमारे ऊर्जा क्षेत्र में संग्रहित हो जाते हैं। व्यक्तिगत शांति के पीछे पीछे विश्व शांति आती है। अगर एक-एक व्यक्ति शांत हो जाए तो जन समूह शांत बन जाता है। फिर विश्व का नेतृत्व करने वाले भी शांत हो जाएंगे और हम विश्व शांति पाएंगे।
हमें राजनीति में आध्यात्म, व्यापार सामाजिकता और धर्म में धर्मनिरपेक्षता की आवश्यकता है। बुराई शक्तिशाली नहीं है। तुम उसे शक्ति दे रहे हो। ऐसा लगता है कि बुराई में शक्ति है। पर ऐसा है नहीं। विश्व में सबसे बड़ी शक्ति प्रेम है। जैसे ही प्रेम और ज्ञान सामने आते हैं, बुराई खत्म हो जाती है। जैसे सुबह सूरज निकलने पर ओस गायब हो जाती है। हमने ये अनुभव किया है।
क्या तुम इसके प्रति सजग हो कि हम हमेशा किसी सकरात्मक बात पर शक करते हैं? तुम हमेशा किसी व्यक्ति की ईमानदारी पर शक करते हो। बेइमानी पर शक नहीं करते। जब कोई तुम से कहता है कि ‘मैं तुम से प्रेम करता हूं,’ तो तुम पूछते हो, ‘सच?’ जब कोई तुम से कहता है, ‘मैं तुम से नफ़रत करता हूं,’ तो तुम कभी संदेह नहीं करते।
हम कहते हैं, ‘मैं खुश हूं।’ पर हम दुखी हैं, अवसाद में है, इस पर हमें पूरा यकीन रहता है। हम कभी अपनी कमज़ोरी पर शक नहीं करते। हमेशा अपनी क्षमताओं पर शक करते हैं। तुम गौर करो तो पाओगे कि अच्छाई पर हम शक करते हैं - जैसे, प्रेम, खुशी, ईमानदारी और वफादारी। जहां कहीं भी इन्हें देखते हैं संदेह होने लगता है कि कहीं हमारे साथ छलावा तो नहीं हो रहा। जबकि बुराई पर तुरंत यकीन आता है।