सीता की स्तुति करते हुए ऋग्वेद (4-57-6) में असुरों का नाश करने वाली शक्ति कहा गया है। सीतोपनिषद् में सीता को माना है। जिसके नेत्र के निमेष-उन्मेष मात्र से ही संसार की सृष्टि-स्थिति-संहार आदि क्रियाएं होती हैं, वह सीताजी हैं। शास्त्रों में आए उल्लेखों का सार है कि सीता श्रीराम की शक्ति और राम-कथा की प्राण हैं।
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बाल्मीकि रामायण में कहा गया त्रेता युग में विष्णु श्रीरामचंद्र के रूप में अयोध्या में दशरथ के महल में अवतीर्ण हुए, तभी भगवती लक्ष्मी महाराज जनक की राजधानी मिथिला की पावनभूमि पर अवतरित हुई। शास्त्र कि धारणा है कि चरित्र ही सब कुछ हैं।
वही मनुष्य की शोभा हैं। पंचवटी में राम ने कहा सीता तुम्हारे चरण बहुत ही सुंदर है। सीता बोली, भगवन, आपके पग की रज प्राप्त करने के लिए जीवन भर लोग ललकते रहते हैं। इसका थोड़ा सा रजकण भी यदि प्राप्त हो जाए तो माथे पर लगाकर अपने को धन्य मानते हैं।
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कुछ समय बाद जब लक्ष्मण वहां आए तो सीता ने उनसे कहा लक्ष्मण तुम निर्णय करो कि हम दोनों के चरणों में से किस के चरण शोभायमान हैं। लक्ष्मण ने विनीत भाव से कहा, आप की शोभा चरणों में नहीं अपितु आचरण में है। यह सुनकर राम और सीता एक दूसरे के पद निहार कर बहुत ही प्रसन्न हुए और लक्ष्मण अपलक उन चरणों को देखते रह गए।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार हनुमान जब जानकी की खोज करते हुए लंका में अशोक वाटिका पहुंचे तो रामकथा सुनाई और राम की जो अंगूठी लाए थे, वह दी। जानकी खुश हुईं । अपने कष्ट को व्यक्त किया और आशंका भी जताई। लग रहा था कि जीवन से निराश हो गई थीं। इतना विलंब कैसे हो गया राम को आने में। कहीं भूल तो नहीं गए, कहीं और कोई अवरोध तो नहीं आ गया।
ऐसी स्थिति में हनुमान ने भी बहुत मार्मिक होकर कहा कि राम को आने में विलंब हो रहा है, आपको लग रहा है कि वह समुद्र पार कर पाएंगे या नहीं तो मैं आज ही आपको लेकर रामजी के पास चलता हूं। हनुमान ने उन्हें अपनी शक्ति का भरोसा और परिचय दिया।
इसके उपरांत जानकी जी ने कहा राम के प्रति मेरा जो समर्पण है, जो सम्पूर्ण त्याग है, मेरा पतिव्रता का धर्म है, उसको ध्यान में रखकर मैं राम के अतिरिक्त किसी अन्य का स्पर्श नहीं कर सकती। अब राम यहां आएं, रावण का वध करें, जो उसके लोग हैं, उनको मारें और हमें लेकर जाएं। राम जी ही मुझे मान-मर्यादा के साथ लेकर जाएं, तभी उचित होगा।
राम को यहां आने दीजिए। भगवान के ऐश्वर्य से मैं परिचित हूं, भगवान ने खरदूषण, त्रिजटा और उनकी चौदह हजार सेना को मारकर धूल में मिला दिया, तब उनका कोई सहायक भी नहीं था, उस समय कोई नहीं था जो राम का पक्ष लेता, राम ने सभी को अपनी तेजस्विता से उत्तर दिया।
और संसार में कौन ऐसा है, जो राम से लड़ सकता है? कोई राक्षस नहीं है, जो राम का युद्ध में सामना कर सके। इसलिए आप जाइए और रामजी को मेरा दुख-दर्द बतलाइए और प्रेरित करके रामजी को यहां लाइए और रामजी राक्षसों का विनाश करें, तभी मैं जाउंगी।