दीनबंधु सी एफ एंड्रयूज के सामने वह युवक अनायास ही अपने बारे में बताने लगा। माता-पिता, भाई-बहन और परिवार के लोगों से बिछुड़ कर वह काफी समय जेल में रहा। छूटने के बात कुसंगति में पड़कर वह और बर्बाद हो गया। स्वास्थ्य ने भी उसका साथ छोड़ दिया। जीवन से ऊब होने लगी। अब वह आत्महत्या करने के बारे में सोच रहा था। दीनबंधु ने सुनकर कहा, तुम्हें बुरी आदतों का नतीजा पता नहीं? युवक ने सिर हिलाकर 'हां' में जवाब दिया। दीनबंधु ने कहा, फिर तुमने यह गलती क्यों की? युवक कुछ नहीं बोला।
दीनबंधु ने उसे समझाया। अपने साथ रखा, और महीनों तक उसका उपचार कराया। जब उसका स्वास्थ्य ठीक हो गया, तो उन्होंने कहा, अब तुम जा सकते हो, लेकिन फिर से किसी कुटेव में मत पड़ना। कहीं मेहनत-मजदूरी कर ईमानदारी की जिंदगी जीना। युवक उनकी नसीहत मानकर चल पड़ा। वर्षों बाद एक सुबह दीनबंधु के मकान के सामने एक कार रुकी। सीधे-साधे लिबास में एक प्रौढ़-से व्यक्ति ने उतर कर दरवाजा खटखटाया। कुछ क्षण बाद दीनबंधु बाहर आए। उस व्यक्ति ने भाव विभोर होकर कहा, आपने मुझे पहचाना?
दीनबंधु असमंजस में पड़ गए। अपना परिचय सीधे न देते हुए उसने कहा, मैं वही हूं, जिसने आपसे अमुक महीनों तक सेवा करवाई थी। परिचय पाकर दीनबंधु ने मुस्कराते हुए कहा, अरे! तुम अंदर आओ। युवक ने अपनी कहानी सुनाई कि किस तरह अखबार बेचते हुए वह आज एक फैक्टरी का मालिक बन गया है।
वह अपने साथ ढेर सारे उपहार और दीनबंधु के लिए एक प्रस्ताव लेकर आया था कि वह उसके साथ नए मकान में चलें, जिसे उसने हाल ही में खरीदा था। उसे न करते हुए दीनबंधु ने कहा, इस पैसे को गरीबों की सेवा में लगा देना। चलते-चलते दीनबंधु ने एक बात और कही, जीवन भर दूसरों की सेवा करना, पिछड़ों को उठाना। यही सच्ची कृतज्ञता होगी।