बालक का नाम नरेंद्र था, जिसके पिता बचपन में ही चल बसे थे। समय बीता और नरेंद्र बड़ा होने लगा। लेकिन उसमें परिश्रम की रुचि बिल्कुल नहीं थी। मां किसी काम के लिए कहती, तो कहता- 'साधु महात्मा भी तो कोई काम नहीं करते। फिर मुझे काम की क्या जरूरत है?' एक दिन मां एक महात्मा के पास गई और अपनी परेशानी बताई। महात्मा ने अगली सुबह उन्हें बुलाया और ताकीद दी कि 'उससे कहना कि महात्मा जी जो कहते हैं, वह सच हो जाता है।
मैं उसे मेहनत करने का एक मंत्र दूंगा।' रात को मां ने बेटे को महात्मा के बारे में बताया। यह भी कह दिया कि वह पैसे प्राप्त करने का मंत्र बताएंगे। नरेंद्र सुबह चार बजे ही उठकर तैयार हो गया और मां के साथ महात्मा के पास पहुंच गया। वहां पहुंचकर देखा कि महात्मा जी सुबह-सुबह कठोर व्यायाम कर रहे हैं। उसे आश्चर्य हुआ कि महात्मा जी क्यों महेनत कर रहे हैं। महात्मा जी बोले- 'बेटा तुम लोगों को तो मैं रात सपने में देख रहा था। पहले मैं अपना नहाना धोना समाप्त करके भगवान की पूजा कर लूं। फिर सपने के बारे में बताऊंगा।
इतना तो तय है कि तुम्हारा कल्याण होने ही वाला है।लेकिन...!' इतना कहकर वह चुप हो गए। नरेंद्र हकलाता हुआ बोला- 'लेकिन क्या महाराज?' महाराज बोले- 'सपना पूरा करना है, तो कठिन मेहनत करनी होगी।' नरेंद्र ने झट से कहा- 'महाराज मैं सौगंध खाकर कहता हूं कि जब तक वह सपना पूरा नही कर लूंगा तब तक महेनत करुंगा। स्नान, ध्यान, पूजा आदि नित्य कर्म पूरा करके महात्मा उठे, तो देखा कि नरेंद्र उनका इंतजार कर रहा था। उन्होंने नरेंद्र को बुलाया और कहा, बेटे तुम्हारे खेतों में सालों से हल नहीं चला है। उन्हीं खेतों में कहीं एक बड़ा-सा घड़ा तुम्हारे पिता जी गाड़ गए हैं। एक महीने में नरेंद्र ने सारी जमीन खोद डाली। लेकिन वहां कोई घड़ा नहीं मिला। निराश होकर वह महाराज के पास पहुंचा। महात्मा जी बोले- 'बेटा, तुम्हारी मेहनत से पैदा हुई खेत की फसल ही तो हरा सोना है।'