जब आप आध्यात्मिक होने की इच्छा करते हैं, तो इसका मतलब है कि आप स्थूल की सीमाओं से परे जाना चाहते हैं। इस खोज में, सबसे बड़ी बाधा है- मौत से आपका डर। जब आपका वर्तमान का अनुभव पर्याप्त नहीं होता है, तभी आप कहीं और जाना चाहते हैं।
अगर यह पल पर्याप्त रूप से महत्वपूर्ण है, तो आप कहां जाना चाहेंगे? यह ऐसा ही है, मानो आप लंगर डालकर नाव चला रहे हैं। यह सिर्फ ऊर्जा और जीवन की बड़ी बरबादी है। मगर एक बार जब आप स्थूल से परे चले जाते हैं, तो आप समय और स्थान को बस अपने चेतन दिमाग की कल्पना पाएंगे।
समय और स्थान भौतिक सृष्टि के लिए जरूरी आयाम हैं। मगर जब आप स्थूल से परे किसी आयाम को स्पर्श करते हैं, तो यहां-वहां, अब-तब जैसी कोई चीज नहीं होती। भौतिक विज्ञानियों का कहना है कि शून्यता की स्थिति में सृजन और विनाश की एक पूरी प्रक्रिया लगातार चल रही है।
भौतिकविज्ञानी विस्तृत होते ब्रह्मांड की बात करते रहे हैं। अब कहा जा रहा कि जिस तरह कभी ‘बिग बैंग’ धमाका हुआ था, संभव है कि किसी दिन बड़ा विनाश हो। यह ब्रह्मांड किसी बहुत सूक्ष्म चीज से विशाल चीज में विस्तृत हुआ है, इसकी उल्टी प्रक्रिया भी हो सकती है।
जब हम निर्वाण, मोक्ष अथवा शून्य की बात करते हैं, तो हम यही कह रहे होते हैं कि यह ब्रह्मांड शून्य से उत्पन्न हुआ और अगर आप उसे पूरा चक्र करने दें, तो वह एक बार फिर से बिल्कुल शून्यता की स्थिति में चला जाएगा।