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'पूजा-पाठ नहीं करने वाले लोग भी होते हैं धार्मिक'

Fri, 24 May 2013 11:38 AM IST
राकेश/इंटरनेट डेस्क
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हमारे बीच बहुत से लोग ऐसे लोग हैं जो हर दिन मंदिर जाते हैं और धार्मिक पुस्तकों का पाठ करते हैं। इसके उलट कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपने काम में इतने व्यस्त रहते हैं कि मंदिर जाना और धर्म-कर्म के लिए समय नहीं दे पाते। समाज ऐसे लोगों को नास्तिक और ईश्वर विरोधी कहने लगता है।
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लेकिन शास्त्रों के मुताबिक ऐसा कहना ठीक नहीं। शास्त्रों के मुताबिक भले ही कोई मंदिर या तीर्थ नहीं जाए लेकिन हृदय में मानव हित और जनकल्याण की भावना रखे तो भी वह ईश्वर भक्त है। ऐसे लोगों की भक्ति उनसे कहीं बढ़कर है जो दिन रात ईश्वर की मूर्ति की पूजा में लगे रहते हैं लेकिन जरा सी बात पर क्रोधित होकर दूसरे को भला-बुरा कहने लगते हैं।

ईसाईयों के धर्मगुरू पोप फ्रांसिस ने भी हाल ही में कहा है कि 'अच्छे कर्म करने वाला मनुष्य धार्मिक है'। भारतीय दर्शन का आधार भगवद्गीता है जिसे भगवान श्री कृष्ण की वाणी भी कहा जाता है। इसमें भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि जो मनुष्य हर समय मुझमें ही मन लगाकर अपना कर्म करता रहता है वह मुझ ही को प्राप्त होता है।
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गीता में श्री कृष्ण ने यह भी कहा है कि संसार में जो भी जीव अथवा निर्जीव तत्व हैं उन सब में वह मौजूद हैं। भगवान श्री कृष्ण ने ऐसा कहकर स्पष्ट कर दिया है कि दिन रात मूर्ति की पूजा या धार्मिक पाठ करने के बजाय जो व्यक्ति हर मनुष्य हर जीव में मेरा अंश मानकर पवित्र भाव से काम करता रहता है वह धार्मिक व्यक्ति है।

श्री कृष्ण जब पृथ्वी पर अपनी लीला दिखा रहे थे उस समय उन्होंने इंद्र की पूजा का विरोध करके पर्वत की पूजा करने के लिए लोगों को प्रेरित किया। भगवान ने ऐसा करके यह समझाया कि जो भी आपकी सहायता करता है जिनका आपके जीवन में महत्व है वह सभी आदरणीय हैं उसी के प्रति हमें श्रद्घा रखनी चाहिए। जरूरी नहीं कि किसी मंदिर या गिरिजाघर में जाकर नतमस्तक होकर बैठे रहें। आपके जो भी कर्तव्य हैं उनका पालन करते हुए जनकल्याण कार्य करने वाला ईश्वर का परम भक्त होता है।

इस संदर्भ में एक कहानी है कि, एक सेठ था, वह कभी मंदिर नहीं जाता था और न कभी धार्मिक कार्यों में दान दिया करता था। सेठ के इस व्यवहार के कारण गांव वाले उसे नास्तिक और कंजूस कहा करते थे। एक बार गांव में बरसात नहीं हुई, खेत सूख गया। लोग भूख के कारण बेहाल होने लगे। ऐसे समय में सेठ ने गांव वालों के बीच जाकर कहा कि मैंने अपने गोदाम के द्वार खोल दिये हैं तुम सभी अपनी जरूरत के हिसाब से अन्न ले लो।

गांव वाले बड़े हैरान हुए कि जिसे वह कंजूस और ईश्वर विरोधी मान रहे थे आज वही ईश्वर बनकर उनकी सहायता करने आया है। लोगों की राय सेठ के प्रति बदल गयी। कभी मंदिर नहीं जाने वाले सेठ की जनकल्याण की इस भावना को देखकर ईश्वर बड़े प्रसन्न हुए और मृत्यु के बाद सेठ को स्वर्ग में स्थान मिला।
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