जहां श्रीकृष्ण हैं, वहीं राधा हैं और जहां राधा हैं, वहीं श्रीकृष्ण हैं। कृष्ण के बिना राधा या राधा के बिना कृष्ण की कल्पना के संभव नहीं हैं। इसी से राधा 'महाशक्ति' कहलाती हैं।
उपनिषद में राधा का परिचय देते हुए कहा गया है कि कृष्ण इनकी आराधना करते हैं, इसलिए ये राधा हैं और ये सदा कृष्ण की आराधना करती हैं, इसीलिए राधिका कहलाती हैं। ब्रज की गोपियां और द्वारका की रानियां इन्हीं राधा की अंशरूपा हैं।
राधा और श्रीकृष्ण एक होते हुए भी क्रीड़ा के लिए दो हो गए हैं। राधिका कृष्ण की प्राण हैं। इन राधा रानी की अवहेलना करके जो कृष्ण की भक्ति करना चाहता है, वह उन्हें कभी पा नहीं सकता।
एक शाप के कारण राधा को धरती पर जन्म लेना पड़ा
स्कंद पुराण के अनुसार राधा श्रीकृष्ण की आत्मा हैं। इसी कारण भक्तजन सीधी-साधी भाषा में उन्हें 'राधारमण' कहकर पुकारते हैं। राधा का प्रेम निष्काम और नि:स्वार्थ है। वह श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित हैं।
राधा श्रीकृष्ण से कोई अपेक्षा नहीं करती। वह सदैव श्रीकृष्ण के आनंद के लिए उद्यत रहती हैं। इसी प्रकार जब मनुष्य सर्वस्व समर्पण की भावना के साथ कृष्ण प्रेम में लीन होता है, तभी वह राधाभाव ग्रहण कर पाता है।
कृष्ण प्रेम का शिखर राधाभाव है। तभी तो श्रीकृष्ण को पाने के लिए हर कोई राधारानीका आश्रय लेता है। बहुतों के लिए आश्चर्य का विषय है कि भागवत में राधा का उल्लेख तक नहीं है।
कहते है कि इसका कारण ऱाधा का निस्पृह प्रेम और कृष्ण के प्रति समर्पण है। भागवत में उनके नाम का उल्लेख इसलिए नहीं है कि राधा ने महर्षि वेदव्यास से स्वयं इसके लिए अनुरोध किया था कि ग्रंथ पूर्णत: श्रीकृष्ण को समर्पित हो, इसलिए उनके नाम का उल्लेख नहीं आना चाहिए।
राधा तो श्रीकृष्ण से रंचमात्र अलग नहीं है। भागवत में भी राधा का निश्चित ही उल्लेख नहीं है लेकिन परोक्ष रूप से उनका नाम छिपा हुआ है। भागवत के रासपंचाध्यायी प्रसंग के अनुसार 'गोपियाँ आपस में कहती हैं- अवश्य ही सर्वशक्तिमान भगवान श्रीकृष्ण की यह आराधिका होंगी।
इसीलिए हमारे प्राणप्रिय श्याम हमें छोड़ कर उसे ले गए हैं। यह गोपी और कोई नहीं बल्कि राधा ही थीं। उस सखी के लिए श्लोक में 'आराधितो' शब्द आया है। इस संबोधन और प्रसंग में ही राधा का नाम भी छिपा हुआ है।