नहीं, ये अनुभव नहीं ये घटनाएं हैं, जो उन्नीस-बीस के फर्क के साथ सबके जीवन में एक सी होती हैं। अनुभव, खरगोश की तरह उछलकर एकदम गोद में नहीं आ बैठता, वह तो केंचुए की तरह धीरे-धीरे सरकता हुआ आता है। कभी-कभी दीमक की तरह भी होता है, जो आपको अंदर तक खोखला कर जाता है।
अंतरिक्ष में जहां बहुत सारी आकाश गंगाएं विचरती रहती हैं, बिना किसी नियम के व बिना किसी बंधन के, वहां कुछ उल्काएं भी नजर आएंगी इधर-उधर बिखरी हुई गिरती पड़ती सी, तो कोई तारा लहराता हुआ निकलेगा, जिसे जब तुम हुश्श! कहते हुए भगाओगे, तो छिपकली की पूंछ की तरह तुम पर ही आ गिरेगा। उसका क्या गया, वह तो दोबारा उगा लेगा अपनी पूंछ, लेकिन तुम उस पूंछ को थामे पूरी जिंदगी मत निकाल देना।
सच है, ये अनुभव नहीं। अनुभव स्थूल नहीं होता। इस बार मुट्ठी में बंद मिट्टी नहीं, अपने हौसले को उछालना मस्तिष्क के आकाश में पूरी ताकत से, ऐसे कि कोई बादल बीच में आए, तो वह भी फट जाए। लेकिन हौसले को रोक न पाए और हां, जैसे बादल के बरसने का कोई नियम न होते हुए भी संपूर्ण प्रकृति एक ही नियम में प्रतिबद्ध होकर चलती है, वैसे ही गति के उस नियम को तुम स्वीकार लो। चाहे सामाजिक भय के नियम टूट भी जाएं, पर गति का ये सार्वभौमिक नियम टूट न पाए। धरा की धुरी पर चाक से एक लकीर खींच लो, तो ध्यान रखना कि वह लकीर बाकी लोगों की खींची लकीर से बड़ी रहे।