दान का सीधा सा अर्थ है देना। लेकिन इसका जिक्र जब भी किसी सराहनीय और अावश्यक काम के तौर पर किया जाता है, तो उसका अर्थ किसी की सेवा-सहायता के लिए कुछ देना ही नहीं है, बल्कि उसके साथ जुड़ी भावना भी काफी महत्वपूर्ण हो जाती है।
स्वामी वेद भारती ने दान के विभिन्न रूपों और विधियों का निचोड़ पेश करते हुए कहा है कि दी गई वस्तु या रकम की मात्रा से ज्यादा उसे देते समय मन में आया भाव मायने रखता है। हो सकता है कि दी गई वस्तु से लोगों की सेवा सहायता हो जाए, लेकिन देते समय मन में आया उदात्त और पवित्र भाव लेने वाले का तो भला करता ही है, वह देने वाले को भी निहाल कर देता है। दान में लोगों को उनकी आवश्यकता की चीजें देकर दान-धर्म का निर्वाह किया जाता है।
ज्यादा कमाई करने वाले लोगों या व्यावसायिक घरानों द्वारा लाभ का एक अंश लोकसेवी कामों में लगाकर दान की प्रक्रिया पूरी की जाती है। यह एक सामाजिक कर्म है, पर भावपूर्वक किए गए दान से देने और लेने वाले, दोनों की आध्यात्मिक जरूरत पूरी होती है।