हम सभी बहुत कुछ जानने का दबा करते हैं। कोई कह दे कि आप जरा अल्पज्ञ हैं तो आग लग जाती हैं मन में। सच तो यही है कि हम सभी अल्पज्ञ यानी अज्ञानी हैं। अल्पज्ञ तो देवता लोग भी हैं, सर्वज्ञ तो मात्र भगवान है, वही सब कुछ जानते है।
वह जिसे चाहे सर्वज्ञ बना दे अन्यथा कमा कर कोई सर्वज्ञ नहीं बन सकता। करोड़ों कल्प कोई पढ़े, मेहनत करे, इकट्ठा करे पर सर्वज्ञ नहीं बन
सकता है। फिर भी हम अपने को अल्पज्ञ सुनने को तैयार नहीं। कारण यह है कि हम वास्तव में अपने को जानते नहीं। कहते तो हैं कि आज रमेश आज चार बजे चला गया, अरे लेटा तो है। जवाब होता है, ये तो
मिट्टी है, लाश है। यानी आपको ज्ञान है कि, शरीर में रमेश कोई और है वह चला गया। अब इस शरीर से कोई प्यार नहीं कर रहा है। बीबी खड़ी है, बाप खड़ा है, बेटा खड़ा है देखने में डर लगता है। और दस बारह घंटे बीत गये तो शरीर से बदबू आने लगती है।
कहने लगते हैं, अरे बाहर निकालो, जलाओ, पानी में डालो, मिट्टी में गाड़ो। अरे इसी शरीर के पीछे तो स्त्री दीवानी थी, वह रमेश चला जिससी स्त्री दीवानी थी। जो चला गया वह जीव था।
इस सत्य को हम जानते हैं कि हमारे शरीर में जो जीव है वही सब कुछ है फिर भी हम कहते हैं मैंने देखा, मैंने सूंघा, मैंने स्पर्श किया मैंने जाना, मैंने सोचा, मैंने जाना। हम खुद को शरीर मानकर चल रहे हैं।
हम कहते हैं हम पुरूष हैं, हम मनुष्य हैं, हम बंगाली हैं, हम पंजाबी। हम ऐसा क्यों बोलते हैं जबकि हम न पुरूष हैं न बंगाली न पंजाबी। हम सभी भगवान के अंश हैं। अगर गहराई से देखें तो हम सभी भगवान के दास हैं।
साभारः कृपालु जी महाराज (ब्रह्म, जीव, माया)
कृपालु जी महाराज परिचय
कृपालु
जी महाराज का जन्म सन् 1922 ई. में शरद्पूर्णिमा की रात्रि में उत्तर
प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के मनगढ़ ग्राम में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ
था।प्रारम्भिक शिक्षा के पश्चात इन्होंने इंदौर, चित्रकूट एवं वाराणसी में
व्याकरण, साहित्य तथा आयुर्वेद का अध्ययन किया। 16 वर्ष की अल्पायु में
कृपालु जी ने चित्रकूट के शरभंग आश्रम एवं वृंदावन के वंशीवट के निकट वनों
में वास किया। 14 जनवरी 1957 को कृपालु जी महाराज को काशी में विद्वानों की
एक सभा ने जगद्गुरू की उपाधि से सम्मानित किया।