पीयूष और उसके दोस्त एक चॉल में रहा करते थे। उस चॉल को काफी दिनों से नगरपालिका वाले खाली करने के लिए बोल रहे थे। चॉल के नीचे की जमीन कच्ची थी और धंस रही थी। किसी भी दिन दुर्घटना हो सकती थी। लेकिन चॉल के निवासी जाएं, तो जाएं कहां! उनके पास रहने के लिए कोई और जगह नहीं थी। जिनके पास थोड़े-बहुत पैसे थे, वे वहां से अपने परिवार को निकाल कर पहले ही किसी सुरक्षित जगह पर रहने के लिए जा चुके थे। एक दिन सुबह-सुबह चॉल के एक हिस्से में कुछ भूकंप जैसा महसूस हुआ। सभी लोग चॉल से बाहर निकल आए।
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उनमें से एक दंपति जल्दबाजी में अपने कुत्ते को घर के अंदर ही बंद कर आए। लेकिन जब पत्नी को इस बात का एहसास हुआ ,तो वह एकदम से चॉल के अंदर जाने के लिए लपकी। सब लोगों ने उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह नहीं मानीं। वह बोलीं, वह कुत्ता नहीं, मेरा बेटा है। मुझे उसकी जान बचानी ही है। ऐसा कहकर वह सभी लोगों को धक्का देते हुए चॉल में वापस चली गईं। उनके अंदर जाने के कुछ ही क्षण बाद वह इमारत गिर गई।
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पीयूष और उसके दोस्तों ने उस महिला की खूब खोज की। सबने उनको आवाजें लगाईं, लेकिन कहीं से कोई आवाज नहीं आई। अंततः एक बड़े से दरवाज़े के नीच वह महिला दबी हुई मिली। पीयूष और उसके दोस्तों ने जब दरवाजा उठाया, तो देखा उस महिला का शरीर ऐसा था, जैसे किसी मंदिर में ईश्वर के सामने झुककर कोई प्रणाम कर रहा हो। हालांकि शरीर के ठंडे होने और अकड़े होने से यह यकीन हो गया था कि वह प्राण त्याग चुकी है। लेकिन पीयूष अब भी नहीं समझ पा रहा था कि वह महिला ऐसे प्रणाम करते हुए कैसे दबी। तभी पीयूष की नजर उनके पेट और पैरों के बीच पड़े उस छोटे से कुत्ते पर पड़ी। पीयूष को देख वह कुत्ता चिल्लाया, वह अभी जिंदा था। वह महिला चॉल के सभी निवासियों के लिए एक बड़ी सीख छोड़ गई थी। मां की ममता ऐसी होती है कि अपनी जान भी छोटी लगती है।
अमर उजाला के हरियाली और रास्ता से साभार