यदि आप चाहते हैं कि आपकी प्रार्थनाएं सुनी जाएं तो आपकी इच्छा तीव्र होनी चाहिए। तीव्र इच्छा आपको भक्ति की ओर ले जाती है। भक्ति तब उत्पन्न होती है जब आपमें आस्था होती है और अपने आस-पास दिव्यता की उपस्थिति का अनुभव करते हैं।
पार्थना इस जल्दबाजी में नहीं रहे कि आपकी इच्छा दिव्यता पूरी कर दे। जब आप दिव्यता से कुछ वरदान पाना चाहते हैं, तो आप जल्दी में हैं। परंतु यदि आप जान लें कि मालिक आपके हैं, तो फिर इस मलकियत में कुछ पाने की जल्दबाजी नहीं रहती। आपको कुछ पाने की जल्दी आपकी समता को बिगाड़ देती है और आपको तुच्छ बना देती है।
आजकल की तेज रफ्तार दुनिया में लोग अधिकतर भय और लोभ के कारण प्रार्थना करते हैं। यदि आप किसी से प्रेम करते हैं, तो फिर आप उसे पाना चाहते हैं और उसके लिए आप प्रार्थना करते हैं। परन्तु सच्ची प्रार्थना, कुछ पाने की इच्छा के विपरीत है। यह ईश्वर का सम्मान और अपना सब कुछ भेंट चढ़ा देना होता है। सम्मान करने से भक्ति आती है जिससे समर्पण उत्पन्न होता है। भक्ति से जीवन को संजीविनी बूटी मिल जाती है।
प्रार्थना का मर्म भक्ति और श्रद्धा है। भक्ति और श्रद्धा के बिना सच्ची प्रार्थना हो ही नहीं सकती है। श्रद्धा से आप यह महसूस करते हैं कि ईश्वर का आश्रय हमेशा आपके साथ है। भक्ति एक आतंरिक प्रफुल्लता लाती है।
जब तक आपके अंदर प्रभु भक्ति का दीपक नहीं जलेगा तब तक आपके जीवन में बेचैनी रहेगी। भक्ति से आप में प्रभु मिलन की उत्कंठा उत्पन्न होती है। और जब यह उत्कंठा आती है तो सच्ची प्रार्थना अपने आप ही घटित हो जाती है।