दिनांक 11 अप्रैल 2013 को हम विक्रम संवत् 2070 में प्रवेश कर चुके हैं। इस दिन भगवान ब्रह्माजी द्वारा सृष्टि की रचना हुई तथा युगों में प्रथम सत्ययुग का प्रारम्भ हुआ। गुडी पड़वा वर्ष के साढ़े तीन शुभ मुहूर्तों में से एक होता है। इस दिन कोई भी शुभ कार्य करने हेतु मुहूर्त देखने की जरूरत नहीं होती।
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम एवं धर्मराज युधिष्ठिर का राजतिलक दिवस, मत्स्यावतार दिवस, वरुणावतार संत झूलेलालजी का अवतरण दिवस, सिक्खों के द्वितीय गुरु अंगददेवजी का जन्म दिवस, चैत्री नवरात्र प्रारम्भ आदि पर्वोत्सव एवं जयंतियाँ वर्ष-प्रतिपदा से जुड़कर और अधिक महान बन गयीं।
इस दिन ‘गुड़ी पड़वा’ भी मनाया जाता है, जिसमें गुड़ी (बाँस की ध्वजा) खड़ी करके उस पर वस्त्र, ताम्र-कलश, नीम की पत्तेदार टहनियाँ तथा शर्करा से बने हार चढ़ाये जाते हैं। गुड़ी उतारने के बाद उस शर्करा के साथ नीम की पत्तियों का भी प्रसाद के रूप में सेवन किया जाता है, जो जीवन में (विशेषकर वसंत ऋतु में) मधुर रस के साथ कड़वे रस की भी आवश्यकता को दर्शाता है।
भारतीय संस्कृति का यह नूतन वर्ष जीवन में नया उत्साह, नयी चेतना व नया आह्लाद जगाता है। इस सुहावने मौसम में कृषि क्षेत्र सुंदर, स्वर्णिम खेती से लहलहा उठता है। इस प्रकार नूतन वर्ष का प्रारम्भ आनंद-उल्लासमय हो इस हेतु प्रकृति सुंदर भूमिका बना देती है।
इस बाह्य चैतन्यमय प्राकृतिक वातावरण का लाभ लेकर व्यक्तिगत व सामाजिक जीवन में भी उपवास द्वारा शारीरिक स्वास्थ्य-लाभ के साथ-साथ जागरण, नृत्य-कीर्तन आदि द्वारा भावनात्मक एवं आध्यात्मिक जागृति लाने हेतु नूतन वर्ष के प्रथम दिन से ही माँ आद्य शक्ति की उपासना का नवरात्रि महोत्सव शुरू हो जाता है।
नूतन वर्ष प्रारंभ की पावन वेला में हम सब एक-दूसरे को सत्संकल्प द्वारा पोषित करें कि जीवन में आनंद, माधुर्य, शांति हो। वास्तविक उन्नति की ओर ले जानेवाले ब्रह्म ज्ञानी सद्गुरु का सत्संग-सान्निध्य व उनका ज्ञान-ध्यान- यह सब आपको सुलभ हो।’ इस शुभ संकल्प द्वारा ‘परस्परं भावयन्तु’ की सद्भावना दृढ़ होगी और इसी से व्यक्तिगत, पारिवारिक व सामाजिक जीवन में समरसता एवं आत्मिक आनंद का आविर्भाव हो सकेगा।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं –
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।
प्रसाद वह है जिससे सारे दुःख मिट जायें। मनमुख थोड़ी देर जीभ का रसास्वाद लेते हैं, उनकी अपेक्षा भक्त भगवान को भोग लगाकर लेते हैं। यह अच्छा है, ठीक है लेकिन यह प्रसाद, तुम्हारी जिह्वा का प्रसाद परम प्रसाद नहीं है। भगवान और संत चाहते हैं कि तुम्हें वास्तविक प्रसाद मिल जाय। कई जिह्वाएँ तुमको मिलीं और चली गयीं, जल गयीं, तुम ज्यों-के-त्यों! तुम शाश्वत हो, परमात्मा शाश्वत हैं।
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
‘इस देह में यह सनातन जीवात्मा मेरा ही अंश है।' आप भगवान की यह बात मान लो न! भगवान की बात मान लेने से क्या होगा? भगवत्प्राप्ति हो जायेगी। मन की बात मान लेने से क्या होगा कि मन भटका-भटका के न जाने कितनी बार चौरासी लाख योनियों के चक्कर में ले जायेगा। जन्मों-जन्मों से हम-आप अपने को सताते-सताते आये हैं।
यह नूतन वर्ष आपको नूतन संदेश देता है कि अब अपने को सताने से बचें, दुःखों से बचें, जन्म-मरण से बचें, नश्वर आकर्षणों से बचें और आप शाश्वत रस ले। शाश्वत रस, सामर्थ्य की ओर देखें।
‘भगवान सर्वत्र हैं।' यह कहते हैं तो आपके हृदय में हैं न! स्वीकार कर लो।
काहे रे बन खोजन जाई! सर्व निवासी सदा अलेपा तोरे संग सहाई।
अपने हृदयेश्वर की उपासना में लगो। हृदय मधुमय रहेगा। कम-से-कम व्यक्तिगत खर्च, कम-से-कम व्यक्तिगत श्रृंगार, अधिक-से-अधिक सद्गुणों का श्रृंगार; बाहरी सुख के गुलाम बनिये नहीं और दूसरों को बनाइये मत। कम-से-कम आवश्यकताओं से गुजारा कर लीजिये और अधिक-से-अधिक अंतर-रस पीजिये।
जिनको हृदयेश्वर की उपासना से वह (परमात्मा) मिला है, ऐसे महापुरुषों के वचनों को स्वीकार करके आप तुरंत शोकरहित हो जाओ, द्वंद्वरहित हो जाओ, भयरहित हो जाओ, वैर व राग-द्वेष रहित हो जाओ। नित्य सुख में आप तुरंत जग जाओगे, आप महान हो जाओगे। उस हृदयेश्वर के मिलने में देर नहीं, वह दुर्लभ नहीं, परे नहीं, पराया नहीं...
साभारः ‘ऋषि प्रसाद’ विभाग, संत श्री आशारामजी आश्रम
संत श्री आशारामजी बापू का परिचय
संत श्री आशारामजी बापू न केवल भारत को अपितु सम्पूर्ण विश्व को अपनी अमृतमयी वाणी से तृप्त कर रहे हैं। बापूजी का जन्म 8 अप्रैल 1939 को हुआ था। देश-विदेश में इनके 425 से अधिक आश्रम व 1400 से भी अधिक श्री योग वेदांत सेवा समितियाँ लोक-कल्याण के सेवा कार्यों में संलग्न हैं।
गरीब-पिछड़ों के लिए ‘भजन करो, भोजन करो, रोजी पाओ’ जैसी योजनाएँ, निःशुल्क चिकित्सा शिविर, गौशालाएँ, निःशुल्क सत्साहित्य वितरण, नशामुक्ति अभियान आदि सत्प्रवृत्तियाँ भी आश्रम व समितियों द्वारा चलायी जाती हैं। परम पूज्य बापूजी भक्तियोग, कर्मयोग व ज्ञानयोग की शिक्षा से सभी को स्वधर्म में रहते हुए सर्वांगीण विकास की कला सिखाते हैं। तिथि अनुसार वर्ष 2013 में इनका जन्म दिवस 1 मई को मनाया जायेगा।