श्री अरविंद ने स्वयं अपने बारे में कहा है कि उनकी सही जीवनी लिखना संभव नहीं है। क्योंकि जो कुछ भी कहा जाएगा वह ऊपरी या बाहरी घटनाओं का विवरण होगा। उनके आंतरिक जीवन का आभास और उद्घाटन कैसे और कौन कर सकता है? क्षणिक उल्लास और वैयक्तिक या सामूहिक प्रभाव को उपलब्धि नहीं माना जा सकता।
श्री अरविंद ने तो अपने सिद्धान्तों का निरूपण प्रचार की दृष्टि से कभी किया ही नहीं। अपने विचारों से उन्होंने हजारों रंग डाले। उन जैसी महान विभूतियां जो आदर्श और विचार प्रस्तुत करती हैं वही उनकी देन होती है। वे राष्ट्र के लोगों की सोच और भावनाओं में समाहित हो जाते हैं।
श्री अरविंद की प्रासंगिकता का कुछ अहसास या आकलन हम सरसरी तौर पर ही सही उनके जीवन, उनके कार्यों और उनके रचे ग्रंथों, व्यक्त किए विचारों, व्याख्यानों, वार्ताओं और पत्रों से ही कर सकते हैं। उनका प्रारम्भिक जीवन दो भागों में बांटा जा सकता है।
एक प्रारंभिक जीवन जो उनके व्यक्तित्व और विचारों का निर्माण काल कहा जा सकता है। दूसरा है, भारत लौटने के बाद उनके बड़ौदा निवास का समय और उसके बाद देश की राजनीति में प्रत्यक्ष रूप से भाग लेना फिर कुछ समय बाद सक्रिय राजनीति से अलग हो जाना।
इसके बाद पांडिचेरी में योग के निरन्तर प्रयोग और पूर्ण योग की अवधारणा। शैशव और शिक्षण काल को छोड़ दें तो राजनीति में सक्रिय भाग लेने का समय केवल पांच साल। उसमें भी एक वर्ष मुकदमा चला और फिर कारावास। बड़ौदा कांग्रेस अधिवेशन में विघटन में उन्होंने पहल की। यही नहीं व्याख्याकारों का मत है कि अतिवाद को बौद्धिक और वैचारिक पृष्ठभूमि उन्होंने ही प्रशस्त और प्रदान की थी।
पांडिचेरी में वे लगभग चालीस वर्ष तक रहे। भारतीय दर्शन के विकास में शंकराचार्य तथा महावीर और बुद्ध के बाद श्री अरविन्द, महात्मा गांधी और महर्षि रमण ही प्रमुख हैं। उनकी अतिमानस की अवधारणा और धरती के दिव्यीकरण की कल्पना ने श्री अरविन्द को विश्व मानव बना दिया।
1893 का वर्ष भारत के इतिहास में स्मरणीय है। उसी वर्ष श्री अरविन्द भारत लौटे, गांधी जी अफ्रीका गए। स्वामी विवेकानंद अमेरिका के लिए रवाना हुए और श्रीमती एनी बीसेन्ट थियोसोफिकल सोसायटी के कामों के लिए भारत में आई। जो भूमिका भारत के भविष्य के लिए इन चारों विभूतियों की है, वह केवल संयोग ही है या नियति का निर्देशन। श्री अरविन्द तो एक आस्था पुरुष थे।