जीवात्मा प्राण, मन तथा इंद्रियों के साथ अपने पूर्व शरीर को त्याग देता है और एक नवीन शरीर धारण करती है। अविद्या,शुभ-अशुभ कर्म और पूर्वजन्मों के संस्कारों को भी वह अपने साथ ही ले जाती है।
जिस प्रकार कीड़ा दूसरी घास पर अपने पांवों को टिकाकर ही पहले की घास की पकड़ को छोड़ता है; वैसे ही इस वर्तमान शरीर को छोड़ने के पहले जीवात्मा को आने वाले शरीर का भान रहता है।
सांख्यमत के अनुसार जीव, इंद्रियां दोनों ही व्यापक हैं और जब नया शरीर धारण करना होता है, तब कर्म के अनुरूप ही नए शरीर का कार्य प्रारंभ हो जाता है। बौद्ध मत के अनुसार 'नए शरीर में आत्मा इंद्रियों के बिना अकेले ही कार्य प्रारंभ करती है।
वैशेषिकों के मतानुसार 'अकेला मन ही नए शरीर में प्रवेश करता है। दिगंबर जैन के मत के अनुसार 'जिस प्रकार एक तोता एक वृक्ष को छोड़कर दूसरे वृक्ष पर उड़ जाता है, उसी प्रकार अकेला जीवात्मा पुराने शरीर को छोड़कर नए शरीर में चला जाता है। ये संपूर्ण मत समीचीन नहीं है और ये वेद विरुद्ध भी हैं।
'जीवात्मा मन प्राण, इंद्रिय तथा सूक्ष्म भूत अथवा तन्मात्राओं के साथ ही पुराने शरीर में चला जाता है, यह विचार ठीक है। जीवात्मा नए शरीर के लिए बीज रुप सूक्ष्म भूतों या तन्मात्राओं को अपने साथ ले जाता है।
ये सभी तन्मात्राएं जीवात्मा के साथ ही जाती हैं। जब जीवात्मा शरीर का त्याग करता है, तब सबसे पहले मुख्य प्राण शरीर छोड़ देता है और तब उसका अनुसरण करते हुए दूसरे सभी प्राण भी चले जाते हैं। ये सब प्राण तन्मात्राओं की भूमिका अथवा मूल आधार के बिना कहीं टिक नहीं सकते हैं।