आत्मज्ञान एक ऐसी ऊँचाई है कि वहाँ यह नहीं
सोचा जाता कि सामनेवाले को इसकी जरूरत है या नहीं। वह इतना दिव्य अमृत है कि सामने
वाले को जरूरत हो तो भी दो और जरूरत न हो तो उसमें जरूरत जगाकर भी दो, ताकि उसका
परम कल्याण हो। समाज को आत्मज्ञान की जरूरत नहीं है ऐसा कहना सही नहीं है।
मनुष्यमात्र को ही नहीं प्राणिमात्र को सुख की जरूरत है।
वास्तव में जिन
चीजों की इतनी जरूरत नहीं है, उन चीजों में समाज बहा चला जा रहा है। बहते हुए समाज
को देखकर ऋषियों का हृदय करुणा से भर आया। ऐसे महापुरुष हुए जिन्होंने महसूस किया:
‘वास्तव में समाज को ज्ञान की जरूरत तो है लेकिन वह नहीं समझता तो उसे समझाना
पड़ेगा।’
माँ देखती है कि बच्चा ठीक से भोजन नहीं कर रहा है, ऐसी-वैसी बाजारू
चीजें खा रहा है तो सच्ची माँ चिंतित होती है। वह बच्चे को घर का भोजन मिले ऐसा
प्रयास करती है। सौतेली माँ कहेगी: ‘अगर बच्चे को जरूरत नहीं है तो मैं क्या करूँ
? वह माँगेगा तो दूँगी।’
हमारे ऋषि समाज की सौतेली माँ नहीं हैं। वे
मनुष्य-जाति के सच्चे माता-पिता हैं। ऋषि के प्रसाद को ग्रहण करने का, सुनने का समय
लोगों के पास नहीं हो, फिर भी ऋषि लोग चाहते हैं कि किसी भी बहाने लोग आत्मज्ञान
सुनने आ जायें। आत्मज्ञान कितना दिव्य है, उसका क्या मूल्य है यह तो तुम आध्यात्मिक
इतिहास देखो तो पता चलेगा।
बड़े-बड़े सम्राटों ने राजपाट छोड़कर, सिर में खाक
डालकर, हाथ में काँसा (भिक्षापात्र) लेकर आत्मज्ञानी गुरुओं को रिझाया है। सम्राट
तो क्या होते हैं, यहाँ अवतार-भगवान राम जैसे महान आत्मा भी गुरुओं का बड़ा आदर करते
हैं!
प्रातःकाल उठि कै रघुनाथा।
मातु पिता गुरु नावहिं माथा॥ (श्री रामचरित.
बा.कां. : 204.4)
भगवान राम सुबह-सुबह गुरु के आश्रम में पहुँच जाते थे और
गुरुजी समाधि में होते तो हाथ जोड़कर दूर ही खड़े रह जाते। जब वे समाधि से उठते तब
साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करते थे। कौन? जिनका नाम जपकर लोग तर जाते हैं वे भगवान
राम! श्रीराम जानते थे कि आध्यात्मिक विद्या का क्या महत्त्व है! श्रीकृष्ण भी गुरु
सांदीपनि की सेवा में रहे थे।
गुरुभाइयों के साथ जंगल में लकड़ियाँ काटने
जाते थे। विद्याध्ययन समाप्त होने पर श्रीकृष्ण ने गुरु के चरणों में प्रार्थना
की:
‘‘गुरुदेव ! आज्ञा करो। श्रीचरणों में क्या गुरुदक्षिणा दूँ? क्या सेवा करूँ
?’’
गुरुदेव बोले: ‘‘मुझे तो कोई आवश्यकता नहीं है।’’
‘‘गुरुदेव ! आपको तो
कोई आवश्यकता नहीं है लेकिन मुझे सेवा करने की आवश्यकता है। मेरा कर्तव्य है
।’’
‘‘अच्छा, तो अपनी माँ से पूछ, उसे क्या चाहिए ?’’
श्रीकृष्ण ने गुरुपत्नी
से पूछा: ‘‘माँ ! मैं आपकी क्या सेवा करूँ?’’
गुरुपत्नी ने कहा: ‘‘कृष्ण! तू
हमारा सबसे समर्थ विद्यार्थी है। मेरा बेटा यमलोक चला गया है, वह मुझे ला
दे।’’
श्रीकृष्ण ने नियति की मर्यादा को तोड़कर यमपुरी से गुरुपुत्र को लाकर माँ
की गोद में रख दिया।
‘गीता’ युद्ध के मैदान में कही गयी है। तब समय का बड़ा
अभाव था। कुछ भी अनावश्यक बात करने का समय नहीं था। भगवान ने जो कहा है वह बिल्कुल
संक्षेप में और साररूप है। दोनों सेनाओं के बीच रथ खड़ा है, ऐसे मौके पर भगवान
श्रीकृष्ण कहते हैं:
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन
सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥
‘उस ज्ञान को तू
तत्त्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझ, उनको भलीभाँति दण्डवत् प्रणाम करने से,
उनकी सेवा करने से और कपट छोड़कर सरलतापूर्वक प्रश्न करने से वे परमात्म-तत्त्व को
भलीभाँति जाननेवाले ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्त्वज्ञान का उपदेश करेंगे।’(गीता:
4.34)
जो श्रीकृष्ण के सान्निध्य में रहता है उस अर्जुन को भी श्रीकृष्ण
ज्ञानियों से आत्मज्ञान पाने की सलाह दे रहे हैं। इससे आत्मज्ञान की महिमा का पता
चलता है।
यह आत्मज्ञान मनुष्य-मनुष्य के बीच की दूरी मिटाता है, भय और शोक,
ईर्ष्या और उद्वेग की आग से तपे हुए समाज को सुख और शांति, स्नेह और सहानुभूति,
साहस और उत्साह जैसे दिव्य गुण देते हुए हृदय के अज्ञान-अंधकार को मिटाकर जीव को
अपने ब्रह्मस्वभाव में जगा देता है। जिस-जिस व्यक्ति ने, समाज ने, राष्ट्र ने
तत्त्वज्ञान की उपेक्षा की, तत्त्वज्ञान से विपरीत आचरण किया उसका विनाश हुआ, पतन
हुआ। घूस, पलायनवाद, आतंकवाद और कायरता जैसे दुर्गुण उस समाज में फैले। आपस्तम्ब
धर्मसूत्र (1.22.2) में आता हैः
आत्मलाभात् परं लाभं न विद्यते ।
‘आत्मलाभ
से बढ़कर कोई लाभ नहीं है ।’
मंद और म्लान जगत को तेजस्वी और कांतिमान आत्मसंयम
और आत्मज्ञान के साधन से ही किया जा सकता है।
साभारः ‘ऋषि प्रसाद’ विभाग, संत श्री आशारामजी आश्रम
संत श्री आशारामजी बापू परिचय
संत
श्री आशारामजी बापूजी न केवल भारत को अपितु सम्पूर्ण विश्व को अपनी
अमृतमयी वाणी से तृप्त कर रहे हैं। संत श्री आसारामजी बापू का जन्म सिंध
प्रान्त के नवाबशाह ज़िले में बेराणी गाँव में नगर सेठ श्री थाऊमलजी
सिरुमलानी के घर 17 अप्रैल 1941 को हुआ। देश-विदेश में इनके 410 से भी अधिक
आश्रम व 1400 से भी अधिक श्री योग वेदांत सेवा समितियाँ लोक-कल्याण के
सेवाकार्यों में संलग्न हैं।
गरीब-पिछड़ों के लिए ‘भजन करो, भोजन
करो, रोजी पाओ’ जैसी योजनाएं, निःशुल्क चिकित्सा शिविर, गौशालाएं, निःशुल्क
सत्साहित्य वितरण, नशामुक्ति अभियान आदि सत्प्रवृत्तियां भी आश्रम व
समितियों द्वारा चलायी जाती है। आशा राम बापू जी भक्तियोग, कर्मयोग व
ज्ञानयोग की शिक्षा से सभी को स्वधर्म में रहते हुए सर्वांगीण विकास की कला
सिखाते हैं।