जुए में हार जाने के बाद जब महाराज युधिष्ठिर द्रौपदी सहित वन में भटक रहे थे। उस समय एक बड़ी विचित्र घटना हुई द्रौपदी ने पानी पीने की इच्छा जताई। इस पर युधिष्ठिर ने सहदेव को जल लाने के लिए भेजा। लेकिन सहदेव जल लेकर नहीं लौटा।
युधिष्ठिर को चिंता होने लगी, सहदेव की तलाश में नकुल को भेजा। नकुल भी वापस नहीं आया तब बारी-बारी से अर्जुन और भीम को भेजा गया। लेकिन यह भी लौटकर नहीं आए। अब तो युधिष्ठिर काफी परेशान हो गए। युधिष्ठिर द्रौपदी को लेकर वन में भाईयों की तलाश करने लगे। तभी एक सरोवर के निकट उन्हें सभी भाई मूर्छित मिले।
युधिष्ठिर ने आवाज लगाई कि किसने मेरे भाईयों का यह हाल किया है। तभी वहां एक यक्ष प्रकट हुआ और कहने लगा कि तुम्हारे भाईयों ने मेरे प्रश्नों का उत्तर दिए बिना मेरे सरोवर का जल पीना चाहा। इसलिए मैंने इनकी यह दशा की है। अगर तुम मेरे प्रश्नों के उत्तर दे दो तब तुम मेरे सरोवर का जल पी सकते हो।
युधिष्ठिर ने यक्ष के सभी प्रश्नों के उत्तर दे दिए। इससे प्रसन्न होकर यक्ष अपने वास्तविक स्वरुप धर्मराज के रुप में आ गए। धर्मराज ने युधिष्ठिर के सभी भाईयों को भी जीवित कर दिया।
यह घटना जहां हुई थी वह स्थान काम्यवन में मौजूद है। इस वन में एक कुण्ड है जो धर्म कुंड के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि इसी कुण्ड में जल पीने की चाहत में पांडवों के प्राण संकट में पड़ गए थे।
धर्मकुंड से कुछ दूरी पर एक मंदिर है जहां द्रौपदी सहित पांडवों की मूर्तियां हैं। पुजारी लक्ष्मण प्रसाद के अनुसार 30-40 साल पहले मंदिर में चोरी हुई थी। चोर नकुल और भीम की मूर्ति चुरा कर ले गए। मंदिर की स्थिति भी जर्जर है। पौराणिक धर्म कुण्ड का पानी इतना दूषित हो चुका है कि अब आप उसे पी नहीं सकते।