फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कांवड़ियों के बारे में यह बात आप नहीं जानते होंगे

विज्ञापन
विज्ञापन
आपने कांवड़िए तो बहुत देखे होंगे। यह अपने कांधे पर एक कांवड़ लिए होते हैं जिसके दोनें सिरे पर एक बर्तन में गंगा जल भरा होता है।
विज्ञापन


कांवड़िए गंगा जल लेकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं और इसके साथ ही इनकी कांवड़ यात्रा पूरी होती है। लेकिन कांवड़िए सिर्फ एक प्रकार के नहीं होते। इनके इतने प्रकार के है कि आप जानेंगे तो हैरान रह जाएंगे।
Trending Videos

कांवड़ यात्रा से पहले करते हैं ऐसा अभ्यास

सामान्य कांवड़िए तो आपने खूब देखे होंगे जो रास्ते में भोजन पानी करते हुए। मार्ग में विश्राम करते हुए शिवालय पहुंचकर शिव जी का अभिषेक करते हैं। लेकिन यहां आपको कुछ ऐसे कांवड़ियों के बारे में बताते हैं जो अनोखे हैं। ऐसे ही कांवड़ियों का एक प्रकार है डाक कांवरिया।

ऐसे कांवड़िए गंगा जल लेकर लगातार चलते हैं और कहीं मार्ग में रूकते नहीं है। जल उठाने के बार करीब 24 घंटे में यह शिव का जलाभिषेक करते हैं। इसके लिए यह कांवड़ यात्रा शुरू करने से काफी समय पहले से ही मल-मूत्र पर नियंत्रण रखने का अभ्यास करते हैं।

यह सभी काम खड़े खड़े करते हैं

कांवरियों का एक अन्य प्रकार होता है जिसे खड़ा कांवड़िया कहते हैं। अपने नाम के अनुसार ऐसे कांवड़िए रास्ते में कहीं बैठते नहीं। भोजन, उत्सर्जन सभी काम खड़े खड़े करते हैं।

इशारों में बात करने वाले कांवरिए

कांवरियों का एक वर्ग ऐसा होता है जो गंगा जल उठाने के बाद कहीं बातचीत नहीं करते, यह सिर्फ बोल बम और शिव की रट लगाते चलते हैं।

ऐसे कांवड़ियों को मौनी कांवड़िया कहा जाता है। ऐसे कांवड़िए जब किसी से बात करते हैं तो शब्दों की बजाए इशारों से बात करते हैं।

माहवारी कांवडिया

कांवड़ियों की श्रेणी ऐसी है जो हर माह कांवड़ में जल लाकर बाबा का जलाभिषेक करते हैं। ऐसे कांवड़ियों को महावारी या मासिक कांवडिया कहा जाता है।
विज्ञापन

इनकी भक्ति देख हैरान रह जाएंगे

भोले बाबा के भक्तों में कुछ ऐसे भी कांवड़िया होते हैं जो महीनों कांवड़ लेकर यात्रा करते हुए शिव के धाम पहुंचते हैं। इसका कारण यह है कि यह अपने हाथ में एक छोटी सी लकड़ी रखते हैं। इस लकड़ी से दंड प्रणम करने के बाद एक लकीर खींचते हैं।

इसके बाद फिर उस लकीर पर खड़े होकर जमीन पर लेटते हैं और फिर अगली लकीड़ खींचते हैं। इस तरह कुछ दूर जाने के बाद वापस लौटकर आते हैं और अपना कांवड़ लेकर उस स्थान तक पहुंचते हैं जहां तक दंड प्रणाम देते हुए पहुंचे थे। इस प्रकार इनकी यात्रा चलती रहती है।
पढ़ें,आखिर भोलेनाथ को कांवर चढ़ाने की परंपरा क्यों है?

पढ़ें,जिस धनुष को तोड़कर राम बने सीता के, जानिए उस धनुष का राज
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें