पूरे साल में दो बार सूर्य और
कुमार कार्तिकेय की पूजा साथ-साथ होती है। इसे षष्ठी व्रत कहा जाता है। एक शरद ऋतु
के आगमन पर और दूसरा गर्मी के आने पर। गर्मी के मौसम में आयोजित छठ पठ को चैत्र
षष्ठी एवं स्कंद षष्ठी के नाम से जाना जाता है। इस वर्ष यह पर्व 16 अप्रैल को मनाया
जाएगा।
पण्डित मुरली झा बताते हैं कि, चैत्र मास का षष्ठी व्रत न केवल
गृहस्थों के लिए समृद्धि और संतान सुख प्रदायक माना गया है बल्कि यह छात्रों के लिए
भी कल्याणकारी है। चैत्र शुक्ल षष्ठी तिथि के दिन व्रत रखकर प्रातः काल कुमार
कार्तिकेय की पूजा करनी चाहिए।
मान्यता है कि इस दिन ब्राह्मी का रस और घी
का सेवन करने से बौद्धिक क्षमता एवं स्मरण शक्ति बढ़ती है। शास्त्रों में चैत्र मास
के छठ व्रत को इसलिए महत्व दिया गया है क्योंकि यह नवरात्र पर्व के साथ मनाया जाता
है।
देवी के पांचवें रूप की पूजा कुमार कार्तिकेय की माता के रूप में होती
है इसलिए यह देवी स्कंदमाता कहलाती हैं। षष्ठी तिथि को कुमार कार्तिकेय की पूजा
करने से स्कंदमाता की कृपा प्राप्त होती है। मान्यता है कि स्कंदमाता कुमार
कार्तिकेय की पूजा से जितनी प्रसन्न होती हैं उतनी स्वयं की पूजा से भी नहीं होती।
शास्त्रों में जो उल्लेख मिलते हैं उसके अनुसार सूर्य पुत्र कर्ण ने षष्ठी
तिथि के अवसर पर सूर्य की पूजा का नियम शुरू किया था। कर्ण अंग देश यानी वर्तमान
बिहार में स्थित भागलपुर के राजा थे। इसलिए बिहार से षष्ठी तिथि के दिन सूर्य पूजा
की परंपरा की शुरूआत हुई।