भगवान शिव की पूजा में शंख से पूजा करना वर्जित
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सावन का पवित्र महीना चल रहा है। यह माह भगवान भोलेनाथ को समर्पित होता है। इसमें भगवान शिव की पूजा-उपासना, जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और व्रत-उपवास रखे जाते हैं। सावन का महीना 09 अगस्त तक चलेंगा। हिंदू धर्म में सभी-देवताओं की पूजा और उन्हें प्रसन्न करने के लिए कई तरीकों का प्रयोग किया जाता है। हिंदू धर्म में पूजा के दौरान और बाद में शंख को बजाया जाता है, जिसे बहुत ही शुभ माना जाता है। शंख भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को बहुत ही प्रिय होता है। लेकिन शिवजी की पूजा-उपासना में शंख की प्रयोग करना वर्जित होता है। सनातन धर्म में सभी वैदिक कार्यों में शंख का विशेष स्थान है। सुख-समृद्धि और सौभाग्यदायी शंख को भारतीय संस्कृति में मांगलिक चिह्न के रूप में स्वीकार किया गया है । जिस तरह से भगवान विष्णु को शंख बहुत ही प्रिय है और शंख से जल अर्पित करने पर भगवान विष्णु अति प्रसन्न हो जाते हैं, वहीं भगवान शिव की पूजा में शंख का प्रयोग वर्जित माना गया है। जिसके चलते महादेव को ना तो शंख जल अर्पण किया जाता है और न शिव की पूजा में शंख बजाया जाता है। आइए जानते हैं इसके पीछे की पौराणिक कथा।
शंख की पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं में शंख की उत्पत्ति के बारे में विस्तार से बताया है गया है। शिवपुराण की कथा के अनुसार दैत्यराज दंभ की कोई संतान नहीं थी। उसने संतान प्राप्ति के लिए भगवान विष्णु की कठोर तपस्या की थी। दैत्यराज के कठोर तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उससे वर मांगने को कहा। तब दंभ ने महापराक्रमी पुत्र का वर मांगा। विष्णु जी तथास्तु कहकर अंतर्धान हो गए। इसके बाद दंभ के यहां एक पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम शंखचूड़ पड़ा।
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ब्रह्माजी ने दिया शंखचूड़ को श्रीकृष्ण कवच
शंखचूड़ ने ब्रह्माजी को प्रसन्न करने के लिए घोर तप किया। तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मदेव ने वर मांगने के लिए कहा, तो शंखचूड ने वर मांगा कि वो देवताओं के लिए अजेय हो जाए। ब्रह्माजी ने तथास्तु कहकर उसे तीनों लोकों में मंगल करने वाला श्रीकृष्णकवच दे दिया। इसके बाद ब्रम्हाजी ने शंखचूड के तपस्या से प्रसन्न होकर उसे धर्मध्वज की कन्या तुलसी से विवाह करने की आज्ञा देकर अंतर्धान हो गए। ब्रह्माजी की आज्ञा से तुलसी और शंखचूड का विवाह संपन्न हुआ।
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शिवजी भी नहीं कर पाए वध
ब्रह्माजी से वरदान मिलने के बाद शंखचूड में अहंकार आ गया और उसने तीनों लोकों में अपना स्वामित्व स्थापित कर लिया। शंखचूड़ से त्रस्त होकर देवताओं ने विष्णुजी से सहायता मांगी, लेकिन भगवान विष्णु ने खुद दंभ पुत्र का वरदान दे रखा था इसलिए विष्णुजी ने शंकर जी की आराधना की, जिसके बाद शिवजी ने देवताओं की रक्षा के लिए चल दिए, लेकिन श्रीकृष्ण कवच और तुलसी के पतिव्रत धर्म की वजह से शिवजी भी उसका वध करने में सफल नहीं हो पा रहे थे।
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हड्डियों से शंख का जन्म हुआ
इसके बाद विष्णु जी ने ब्रम्हाण रुप धारण कर दैत्यराज से उसका श्रीकृष्णकवच दान में ले लिया और शंखचूड़ का रूप धारण कर तुलसी के शील का हरण कर लिया। इसके बाद भगवान शिव ने अपने विजय नामक त्रिशूल से शंखचूड का वध कर दिया। शंखचूड़ की हड्डियों से शंख की उत्पत्ति हुई। भगवान शिव ने शंखचूड़ का वध किया था, इसलिए उनकी पूजा में न तो शंख बजाया जाता है और न ही शंख से शिवजी का जलाभिषेक किया जाता है।