शनि का नाम आते ही लोगों के मन में तरह-तरह के ख्याल आने लगते हैं। हर किसी को लगता है कि शनि पापी और क्रूर ग्रह होने के कारण यह परेशानियां, दंड और खराब परिणाम देते हैं। शनि का ज्योतिष शास्त्र में विशेष महत्व होता है। शनिदेव न सिर्फ दंड देते हैं बल्कि यह कर्मफलदाता भी है। यह व्यक्ति को कर्मों के अनुसार ही शुभ और अशुभ दोनों ही तरह के फल देते हैं। व्यक्ति के अच्छे कर्मों पर शनि अच्छा फल प्रदान करते हैं जबकि बुरे कर्म करने पर व्यक्ति को शनिदेव दंडित करते है। शनि अगर शुभ हो तो यह व्यक्ति को फर्श से अर्श तक पहुंचा देते हैं। इस कारण से शनि न्याय के देवता और कर्मफलदाता है।
अगर शनि की अशुभ द्दष्टि किसी व्यक्ति के ऊपर पड़ जाए तो व्यक्ति के जीवन में तरह-तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। शनि की अशुभ द्दष्टि से आर्थिक परेशानियां, नौकरी में संकट, मान-सम्मान में गिरावट और कलेश में वृद्धि होती है। वहीं अगर किसी जातक पर शनि की शुभ द्दष्टि पड़ जाए तो जातक का जीवन खुशियों से भर जाता है। जातक अच्छी नौकरी और धनी हो जाता है। कुछ कार्यों को करने से शनिदेव प्रसन्न होते हैं तो वहीं कुछ कार्य ऐसे होते हैं जिसको करने से शनिदेव नाराज हो जाते हैं। शनि के नाराज होने पर व्यक्ति को तरह-तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। आइए जानते हैं किन काम को करने पर शनिदेव नाराज हो जाते हैं और अपनी अशुभ द्दष्टि के प्रभाव से परेशानियों में वृद्धि कर देते हैं।
व्यक्ति को ये आदतें जो शनिदेव को नाराज करती हैं
- बूढ़े लोगों से गलत व्यवहार करने पर
- गरीबों और असहाय व्यक्तियों को परेशान करने पर
- जूते-चप्पल को घसीट कर चलने पर
- लगातार पैर हिलाने की आदत पर
- किसी का उधार धन न लौटाने पर
- गंदगी करने पर
शनि की अशुभ द्दष्टि से बचने के उपाय
- नियमित रूप से हनुमान चालीसा का पाठ करें।
- शनि के बीज मंत्र का जाप करने पर
- शनिदेव को तेल और तिल अर्पित करने पर
- शनि चालीसा का पाठ करने पर
ज्योतिष में शनि का महत्व
वैदिक ज्योतिष शास्त्र में शनिदेव को न्याय का देवता और कर्मफलदाता कहा जाता है। सभी नौ ग्रहों में शनि सबसे धीमी गति से चलने वाले ग्रह हैं। कुंडली में शनि की शुभ स्थिति होने पर यह जातक को धनवान और अपने क्षेत्र का महारथी बना देते हैं। शनि के अशुभ प्रभाव से व्यक्ति को हर तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ज्योतिष में शनि रोग, पीड़ा, आयु, दुख, तकनीकी, लोहा, सेवक और जेल का कारक होता है। शनि मकर और कुंभ राशि के स्वामी होते हैं। तुला राशि में उच्च के जबकि मेष राशि में नीच के होते हैं। शनि एक से दूसरी राशि में गोचर करने के लिए करीब ढाई वर्षों का समय लेते हैं।