विजयदशमी के दिन मां
दुर्गा पृथ्वी से अपने लोक के लिए प्रस्थान करती हैं इसलिए विजयदशमी को यात्रा तिथि
भी कहते हैं। विजयादशमी के दिन किसी भी दिशा में यात्रा करने पर दोष नहीं लगता है।
उत्तर भारत में यह भी मान्यता है कि विजयादशमी के दिन प्रातः नीलकंठ का दर्शन शुभ
होता है। इस दिन नीलकंठ देखने से पूरा साल सुखमय व्यतीत होता है।
इसी तरह
उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों एवं महाराष्ट्र में ऐसी मान्यता है कि विजयादशमी के
दिन शमी वृक्ष के पत्तों को घर में लाकर रखने से घर में धन-संपत्ति की वृद्धि होती
है। विजयादशमी के दिन 'शमी वृक्ष' के पत्तों को घर लाने की परंपरा की शुरूआत
अयोध्या के राजा रघु के समय में हुई।
इस संदर्भ में पौराणिक कथा है कि
महर्षि वर्तन्तु का शिष्य था कौत्स। कौत्स की शिक्षा पूरी होने के बाद वर्तुन्तु ने
शिष्य से गुरू दक्षिणा के रूप में 14 करोड़ स्वर्ण मुद्रा की मांग की। कौत्स गुरू
दक्षिणा के लिए स्वर्ण मुद्रा मांगने महाराज रघु के पास गया। यज्ञ में दान के कारण
रघु का खजाना खाली हो चुका था।
कौत्स ने जब महाराज रघु से एक हजार स्वर्ण
मुद्रा की मांग की तब रघु ने कौत्स से तीन दिन का समय मांगा। रघु ने धन जुटाने के
लिए देवराज इन्द्र पर आक्रमण करने का विचार किया। देवराज इन्द्र इससे घबरा गये और
कोषाध्याक्ष कुबेर से रघु के राज्य में स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा करने का आदेश
दिया।
इन्द्र के आदेश पर कुबेर ने रघु के राज्य में शमी वृक्ष के माध्यम से
स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा की। जिस दिन शमी वृक्ष से सोने की वर्षा हुई उस तिथि को
ही विजयादशी उत्सव मनाया जाता है। रघु ने शमी वृक्ष से प्राप्त सोने का इकट्ठा
करवाकर कौत्स को दे दिया। इस घटना के बाद से विजयादशी के दिन लोग इस विश्वास के साथ
शमी के पत्तों को घर लाने लगे कि इससे घर में स्वर्ण एवं धन की वृद्धि होगी।
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार शमी के वृक्ष का संबंध शनि से। शमी की पूजा से
शनि के अशुभ प्रभाव से बचाव होता है। शमी के पत्तों को विजयादशमी के दिन लाकर घर
में रखने के पीछे एक कारण यह भी हो सकता है शनी प्रसन्न रहें और अन्न, धन कमी न आए।