मां दुर्गा की नौ
विभूतियां हैं, नवरात्र के नौ दिनों में हर दिन मां की अलग-अलग विभूतियों की पूजा
होती है। मां दुर्गा अपने नौ रूपों से ज्ञान, विद्या, शक्ति, तंत्र-मंत्र एवं
सृष्टि चक्र को संचलित करती है। नवग्रह भी मां के इन्हीं नौ रूपों के अधीन हैं। जिन
पर मां की कृपा होती है ग्रहों की स्थिति उनके अनुकूल होती है।
नवरात्र में
कलश की स्थापना और जौ बोने परंपरा सदियों से चली आ रही है। शास्त्रों में भी इसका
वर्णन मिलता। इसके पीछे यह मान्यता है कि नवरात्र के दौरान किसी प्रकार की विघ्न
बाधा नहीं आए। कलश स्थापना और जौ बोने के पीछे एक विश्वास यह भी है कि इससे आने
वाला साल कैसा रहेगा पता लग जाता है।
जयंती से भविष्य जानें
कलश
स्थापना के दिन कलश पूजा के दौरान कलश के नीचे जयन्ती बोया जाता है। सामान्यतया दो
से तीन दिन में जौ से अंकुरित होकर जयन्ती निकल आती है। जयन्ती देर से निकलने पर
माना जाता है कि आने वाले साल में काफी परिश्रम करना पड़ेगा। मेहनत का फल विलम्ब से
प्राप्त होगा। जयन्ती का रंग लाल होने पर माना जाता है कि रोग एवं शत्रुओं के कारण
कष्ट हो सकता है।
जयंती का रंग अगर नीचे पीला और ऊपर हरा हो तो साल की
शुरूआत अच्छी नहीं होगी लेकिन बाद में सब कुशल मंगल होगा। इसके विपरीत जयन्ती नीचे
हरा और ऊपर पीला हो तो साल की शुरूआत अच्छी होगी लेकिन बाद में तकलीफ हो सकती है।
जयन्ती पुष्ट और हरा या श्वेत रंग का होने पर साल उत्तम होगा ऐसा माना जाता है।
संकट से मुक्ति के उपाय
पं.विनोद त्यागी कहते हैं कि जयन्ती यदि अशुभ फल
का संकेत देती है तो मां से संकट दूर करने की प्रार्थना करें और दशवीं तिथि को
नवग्रह के नाम से 108 बार हवन करें फिर मां के बीज मंत्र 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं
चामुण्डायै विच्चे नमः स्वाहा से 1008 बार हवन करें। हवन के पश्चात मां की आरती
करें और हवन से प्राप्त भभूत से नित्य तिलक करें।
रोग की भविष्यवाणी होने
पर प्रतिदिन 'रोगान शेषान पहंसि तुष्टा रूष्टा तु कामान्सकलान भीष्टान्॥
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयांति॥ इस मंत्र का
जप करें। अगर इन सब के लिए समय नहीं हो तो नित्य कवच, कीलक, अर्गला और सिद्घ
कुंजिका स्तोत्र का पाठ करने से भी नवग्रह अनुकूल रहते हैं और व्यक्ति कष्ट से पार
होने में सफल होता है।