नेपाल की पवित्र गंडकी नदी में पाए जाने वाले काले, चिकने, अंडाकार पत्थरों को शालिग्राम शिला कहा जाता है। इनमें शंख, चक्र, गदा और पद्म जैसे शुभ चिन्ह स्वाभाविक रूप से अंकित होते हैं। कुछ शिलाओं पर सफेद चक्राकार धारियां होती हैं, जो इन्हें और भी विशेष बनाती हैं। शालिग्राम को भगवान विष्णु का प्रतीक मानकर बड़े श्रद्धा-भाव से पूजा की जाती है। पुराणों में इन शिलाओं को स्वयं ब्रह्मांड रूपी श्रीनारायण का स्वरूप बताया गया है।
शास्त्रों में शालिग्राम का महत्व
पद्म पुराण के अनुसार, जो व्यक्ति शालिग्राम शिला का दर्शन करता है, स्नान कराता है और पूजन करता है वह करोड़ों यज्ञों और कोटि गोदान के बराबर पुण्य प्राप्त करता है। शालिग्राम की स्मृति, कीर्तन, ध्यान और प्रणाम करने से पाप नष्ट हो जाते हैं। जिस स्थान पर शालिग्राम और तुलसी दोनों विराजमान होते हैं, वहां भगवान श्रीहरि के साथ भगवती लक्ष्मी और समस्त तीर्थों का वास होता है। यह स्थान पूर्णतया पवित्र और दिव्य ऊर्जा से भर जाता है।
भगवान शिव द्वारा वर्णित महिमा
भगवान शिव ने स्वयं शालिग्राम की महिमा का उल्लेख करते हुए कहा है कि करोड़ों कमल पुष्पों से की गई उनकी पूजा जितना फल देती है, उससे कई गुना फल शालिग्राम के पूजन से प्राप्त होता है। कोटि-कोटि शिवलिंगों के दर्शन, पूजन और स्तवन से जो पुण्य मिलता है, वह केवल एक शालिग्राम शिला के पूजन से सहज ही प्राप्त हो जाता है। जहां शालिग्राम की नियमित पूजा होती है, वहां किया गया दान और स्नान काशी के पुण्य से भी सौ गुना अधिक फलदायी माना गया है।
शालिग्राम की पहचान
शास्त्रों में यह भी बताया गया है कि सभी शालिग्राम शिलाएं पूजन योग्य नहीं होतीं। छत्राकार शालिग्राम के पूजन से राज्य सुख प्राप्त होता है, जबकि वर्तुलाकार शिला से धन और ऐश्वर्य की वृद्धि होती है। इसके विपरीत, विकृत, फटी हुई, शूल के नोक के समान तीखी आकृति वाली, शकटाकार, पीलापन लिए हुए अथवा भग्न चक्र वाली शालिग्रामशिलाएं दरिद्रता, रोग और हानि का कारण बनती हैं। इन्हें घर या मंदिर में नहीं रखना चाहिए।
शालिग्राम पूजन से जीवन में आता है सौभाग्य
शालिग्राम शिला का पूजन केवल किसी पर्व विशेष तक सीमित नहीं है। प्रतिदिन श्रद्धा से शालिग्राम, तुलसी और शंख को सुरक्षित रखने और नियमित पूजन करने से घर में सुख, शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि बनी रहती है। जल से अभिषेक, दीप अर्पण और तुलसी-दल चढ़ाने जैसे छोटे-छोटे कार्य भी अत्यंत पुण्यदायक माने गए हैं। जहां शालिग्राम की पूजा होती है, वह स्थान तीर्थ बन जाता है। भगवान श्रीहरि ऐसे स्थान को अपने निवास योग्य मानते हैं और वहां सदा अपनी कृपा बनाए रखते हैं।