सनातन धर्म में भगवान शिव की आराधना के लिए सावन के महीने को श्रेष्ठ माना गया है। इस महीने में पूरे विधि विधान के साथ भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए रुद्राभिषेक किया जाता है। रुद्राभिषेक का अर्थ है रूद्र का अभिषेक, यानि शिव जी का अभिषेक करना। शास्त्रों में लिखा है “रुतम्-दु:खम्, द्रावयति-नाशयतीतिरुद्र:” यानि कि शिव सभी दुखों को हरकर उनका नाश कर देते हैं। मान्यता है कि व्यक्ति की कुंडली में मौजूद ग्रहों की अशुभ स्थिति से छुटकारा पाने के लिए यदि रुद्राभिषेक किया जाए तो उससे विशेष लाभ की प्राप्ति और मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। हिन्दू धार्मिक मान्यतों के अनुसार मात्र रूद्र अवतार शिव का अभिषेक करके व्यक्ति सभी देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त कर सकता है। केवल रुद्राभिषेक के द्वारा शिव जी के साथ-साथ अन्य देवगणों की पूजा भी सिद्ध हो जाती है। रुद्राभिषेक के दौरान व्यक्ति अपनी विभिन्न कामनाओं की पूर्ति के लिए भिन्न प्रकार के द्रव्यों का प्रयोग करते हैं।
रुद्राभिषेक से जुड़े नियम
शिवजी का वो मंदिर जो किसी नदी के तट पर स्थित हो या फिर किसी पर्वत के किनारे हो, वहां स्थित शिवलिंग का रुद्राभिषेक करना बहुत अच्छा माना गया है। यदि ये संभव नहीं है तो रुद्राभिषेक के लिए सबसे उत्तम यही होता है कि आप किसी शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग का अभिषेक करें। यदि आपके घर में ही शिवलिंग स्थापित है तो शिव जी का रुद्राभिषेक आप घर पर भी कर सकते हैं। रुद्राभिषेक यदि जल से कर रहे हैं तो उसके लिए तांबे के बर्तन का ही प्रयोग करें। दूध-दही से रुद्राभिषेक करने के लिए तांबे के पात्र का प्रयोग वर्जित माना गया है। भगवान शिव की पूजा में सात्विक रंगों के वस्त्र पहनें और पवित्रता का ध्यान रखें।