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Sawan 2023: केदारनाथ के दर्शन से मनोकामनाएं होती हैं पूरी, जानिए केदारनाथ ज्योतिर्लिंग से जुडी पौराणिक कथाएं

Wed, 19 Jul 2023 11:57 AM IST
विनोद शुक्ला अनीता जैन ,वास्तुविद

सार

केदारनाथ का वर्णन स्कन्द पुराण और शिव पुराण में मिलता है। यह तीर्थ भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। जिस प्रकार कैलाश का महत्व है उसी प्रकार का महत्व शिवजी ने केदार क्षेत्र को भी दिया है। इनके दर्शन-पूजन करने पर सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती हैं
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kedarnath temple
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केदारनाथ का वर्णन स्कन्द पुराण और शिव पुराण में मिलता है। यह तीर्थ भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। जिस प्रकार कैलाश का महत्व है उसी प्रकार का महत्व शिवजी ने केदार क्षेत्र को भी दिया है। इनके दर्शन-पूजन करने पर सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती हैं और मनुष्य की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। सनातन धर्म की आस्था के अनुसार केदारनाथ धाम को ऊर्जा का बड़ा केंद्र माना जाता है। प्रातःकाल भोलेनाथ की पूजा में शिवलिंग को प्राकृतिक रूप से स्न्नान कराकर शुद्ध घी का लेप लगाया जाता है फिर इसके बाद आरती उतारी जाती है। इसके बाद यात्रीगण मंदिर में प्रवेश कर पूजन कर सकते हैं, लेकिन संध्या के समय भगवान का शृंगार किया जाता हैं।  

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जब शिव नर-नारायण की भक्ति से हुए प्रसन्न
भगवान विष्णु के अवतार नर-नारायण ने उत्तराखंड के बद्रिकाश्रम में तप किया था। वे नित्य पार्थिव शिवलिंग की पूजा किया करते थे और भगवान शिव नित्य ही उस शिवलिंग में आते थे। कालान्तर में भगवान आशुतोष प्रसन्न होकर प्रकट हो गए,उन्होंने नर-नारायण से कहा-'मैं आपकी आराधना से प्रसन्न हूं,आप अपना वांछित वर मांग लें'। नर-नारायण ने कहा-' देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं और वर देना चाहते हैं तो आप अपने स्वरूप से यहीं प्रतिष्ठित हो जाएं और पूजा-अर्चना को प्राप्त करते रहें। भक्तों के दुखों को दूर करते रहें'। उनके इस प्रकार कहने पर ज्योतिर्लिंग रूप से भगवान शंकर केदार में स्वयं प्रतिष्ठित हो गए। तदन्तर नर-नारायण ने उनकी अर्चना की और उसी समय से वे वहां 'केदारेश्वर' के नाम से विख्यात हो गए। केदारेश्वर के दर्शन-पूजन से सभी मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है। केदारनाथ में भगवान शंकर का नित्य-सानिध्य बताया गया है और यहां के दर्शनों की बड़ी महिमा बताई गई है।  

भगवान शंकर ने किया बैल का रूप धारण
एक अन्य कथा के अनुसार महाभारत के युद्ध में विजयी होने पर पांडव भ्रातृहत्या के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे। इसके लिए वे भगवान शंकर का आशीर्वाद पाना चाहते थे, लेकिन भोलेनाथ उन्हें दर्शन नहीं देना चाहते थे। भगवान शंकर के दर्शन के लिए पांडव काशी गए, पर वे उन्हें वहां नहीं मिले। वे लोग उन्हें खोजते हुए हिमालय तक आ पहुंचे। भगवान शंकर पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे वहां से अंर्तध्यान होकर केदार में जा बसे। दूसरी ओर, पांडव भी अपनी प्रतिज्ञा के पक्के थे, वे उनका पीछा करते-करते केदार पहुंच ही गए। भगवान शंकर ने तब तक बैल का रूप धारण कर लिया और वे अन्य पशुओं में जा मिले। लेकिन पांडवों को संदेह हो गया था,अत: भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पहाड़ों पर पैर फैला दिए। अन्य सब गाय-बैल तो निकल गए, पर शंकर जी रूपी बैल पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए। भीम बलपूर्वक इस बैल पर झपटे, लेकिन बैल भूमि में अंतध्र्यान होने लगा। तब भीम ने बैल की त्रिकोणात्मक पीठ का भाग पकड़ लिया। भगवान शंकर पांडवों की भक्ति, दृढ संकल्प देख कर प्रसन्न हो गए। उन्होंने तत्काल दर्शन देकर पांडवों को पाप मुक्त कर दिया। उसी समय से भगवान शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं।
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