परंपरा और शास्त्र तो कहते हैं कि जो दान लेता है, वह देने वाले पर अनुग्रह करता है। दान लेने वाला भले ही कातर, याचक और भिक्षु की तरह बर्ताव कर रहा हो, पर ऋषि गौतम के अनुसार असल लाभ तो दान देने वाले को ही मिलता है। बिना कुछ लिए ही किसी को कुछ देने के बाद चित्त में जो प्रफुल्लता आती है, वह अद्भुत है। दानी स्वभाव के कई लोगों के अनुभव में है कि दान देने से कुछ घटता नहीं है। उससे अपनी आत्मीयता का ही विस्तार होता है।
वहीं, कृपण स्वभाव के व्यक्तियों की जिंदगी में अजीब दैन्य और दारुण भाव रहता है। उदारता स्वभाव में खुलापन और संतुष्टि लाती है। दान की इन्हीं बारीकियों का अध्ययन कर रहे तिरुअनंतपुरम के वैदिक विद्वान आचार्य रामकीर्ति के अनुसार, अंतिम समय में और अलग-अलग कठिनाइयों के समय दिए जाने, संकल्प करने या कराने अथवा हाथ से छुआकर किए जाने वाले दानों का भी विज्ञान है। उनके आध्यात्मिक लाभ तो हैं ही, उनमें लौकिक कष्ट निराकरण के उपाय भी हैं।