पिछले अंक में सीता हरण और राम लक्ष्मण का व्याकुल होकर सीता को ढूंढना आपने पढ़ा। आज के अंक में प्रस्तुत है राम जी का किष्किंधा पहुंचना और वानरों से दोस्ती का प्रसंग। चित्रकूट में सीता के नहीं मिलने पर राम और लक्ष्मण सीता को ढूंढते हुए मलय पर्वत को पार कर गए।
मलय पर्वत को उत्तर भारत और दक्षिण भारत की सीमा माना जाता है। पर्वत को पार करने के बाद राम और लक्ष्मण जब आगे बढ़े तब सुग्रीव के गुप्तचरों ने धनुष वाण लिए दो वीरों को देखा तो भयभीत हो गए उन्हें लगा कि सुग्रीव को मारने के लिए वानरों के राजा बाली ने इन्हें भेजा है।
गुप्तचरों ने भागकर सुग्रीव से कहा कि दो वीर युवक वन में धनुष वाण लिए इधर-उधर भटक रहे हैं। सुग्रीव ने हनुमान जी से कहा कि पता करो वह युवक कौन हैं और क्या चाहते हैं। हनुमान जी ब्राह्मण का वेष बनाकर राम जी के पास पहुंच गए। हनुमान जी को जैसे ही पता चला कि दोनों युवक राम और लक्ष्मण हैं वह अपने वास्तविक रूप में आ गए। हनुमान जी ने दास भाव से राम जी के चरण पकड़ लिए। राम जी ने हनुमान को उठाकर गले से लगा लिया।
रामायण में हनुमान जी को वानर रूप में बताया गया है। लेकिन वानर पेड़ की डाली पर रहते हैं घर बनाकर नहीं रहते। इनका न कोई राज्य होता है और न इनकी राजधानी होती है। जबकि हनुमान जी और सुग्रीव का अपना राज्य था और इनकी प्रजा थी। संभवतः हनुमान और सुग्रीव इसलिए वानर कहे गए हैं क्योंकि यह अनार्य थे और राम आर्य थे।
अनार्य मलय पर्वत के पार रहते थे जिसे आज दक्षिण भारत कहा जाता हैं। आर्यों का मानना था कि अनार्य का रहन-सहन वानरों की तरह है उनमें अब सभ्यता का विकास नहीं हुआ है। वनों में प्राप्त कंद मूल और शिकार ही इनके जीवन का आधार था। इसलिए आर्य अनार्य में भेद-भाव था। राम ने सीता की तलाश करने के लिए अनार्य हनुमान की सहायता से वानरों के राजा सुग्रीव से मित्रता की।
रामायण में राम जी की सहायता करने वाले नरों को संभवतः इसलिए वानर कहा गया है क्योंकि वह वन में रहते थे। वानर का एक अर्थ वन में रहने वाले नर भी होता है।
आर्यों द्वारा मित्रता का समान अधिकार प्राप्त होने के कारण वानरों में राम के प्रति अगाध श्रद्घा और समर्पण का भाव आ गया था। समर्पण और निष्ठा के कारण कथित रूप से वानर कहे जाने वाले पिछड़े आर्यों में ने रावण की विशाल सेना को पराजित करने में भगवान राम की भरपूर सहयता की।
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