रामानंद सागर की रामायण का एक दृश्य
रामायण में भगवान श्रीराम की केवल कथा ही नहीं है, बल्कि उसमें एक आदर्श जीवन का सार है, एक मर्यादित जीवन जीने की सीख है। उसमें अधिकार की बजाय कर्तव्यों पर जोर दिया गया है। रामायण में हम जानते हैं कि भगवान श्रीराम को माता सीता का वियोग सहना पड़ा था। लेकिन यह वियोग उन्हें एक श्राप के कारण सहना पड़ा था। वह श्राप किसी और ने नहीं, बल्कि देव ऋषि नारद मुनि ने दिया था। इससे संबंधित एक रोचक कथा है। जो इस प्रकार है...
एकबार नारद मुनि को अपने ब्रह्मचर्य पर अहंकार हो गया। इस अहंकार को उन्होंने भगवान शिव के समक्ष प्रकट किया। उन्होंने महादेव के समक्ष यह कहा कि मेरा ब्रह्मचर्य इतना अटूट है कि इसे स्वयं कामदेव भी नहीं तोड़ पाए। इस पर भगवान शिव ने उनकी प्रशंसा की, परंतु उन्हें इस बात को लेकर भी चेताया कि इस बात को आप अभिमान में आकर भगवान विष्णु जी के सामने न कहें।
परंतु देवर्षि नारद नहीं माने, और वे भगवान विष्णु जी के सामने अपनी इस बात गुणगान करने लगे। जगत के पालनहार भगवान विष्णु उनके अहंकार को समझ गए। उन्होंने उनके इस अहंकार को तोड़ने की रचना एक माया के रूप में रच डाली। दरअसल, विष्णु जी से भेंट करने के पश्चात जब वह वापस जा रहे थे तो उन्हें रास्ते में एक सुंदर महल दिखा। उस महल में विश्वमोहिनी नाम की राजकुमारी के स्वयंवर की तैयारी चल रही थीं। जब नारद मुनि ने राजकुमारी के रूप को देखा तो वह उस पर मोहित हो गए।
वे इस स्वयंवर में हिस्सा लेने के लिए एक अच्छा और सुंदर रूप चाहते थे। इसके लिए वे भगवान विष्णु जी के पास चले गए और उन्होंने विष्णु जी से आग्रह करते हुए कहा कि हे प्रभु! मुझे हरि का रूप दे दीजिए। इस पर भगवान विष्णु जी ने कहा कि हे नारद! मैं आपको हरि का रूप तो दे दूं, लेकिन कहीं ऐसा न हो कि तुम उस रूप को लेकर पछताओ। दरअसल नारद जी नहीं जानते थे कि हरि का एक रूप वानर का भी है।
अब उन्होंने वही रूप नारद को दे दिया। लेकिन इस बात से अनभिज्ञ नारद राजकुमारी विश्वमोहिनी के स्वयंवर में हिस्सा लेने पहुंच गए। जब राकुमारी वरमाला लेकर सभा में उपस्थित हुई तो नारद के बंदर वाले मुख को देखकर बेहद हंसने लगी। उनके रूप का सभा में उपहास उड़ रहा था। नारद मुनि ने सोचा कि ऐसा क्या हुआ जो लोग मुझे देखकर हंस रहे हैं और राजकुमारी मुझे वरमाला नहीं पहना रही है। तभी उस सभा में स्वयं विष्णु जी पधारे और राजकुमारी ने उन्हें अपना वर चुन लिया।
यह देखकर नारद मुनि को आश्चर्य हुआ। उन्होंने पहले तो अपना चेहरा पानी में देखा। अपना बंदरवाला चेहरा देखकर वे बेहद क्रोधित हो गए। ऐसे में उन्होंने क्रोध में आकर विष्णु जी को ये श्राप दे दिया कि जिस तरह से मैं स्त्री के लिए तड़पा हूं। वैसे ही आप धरती पर अपनी स्त्री के वियोग में तड़पेंगे और उस समय वानर ही आपकी मदद करेंगे। जब भगवान विष्णु की माया का प्रभाव खत्म हुआ तो देवर्षि को अपनी गलती का अहसास हो गया। उन्होंने तुरंत ही भगवान विष्णु जी से क्षमा मांगी। जब भगवान विष्णु ने धरती पर प्रभु श्रीराम के रूप में जन्म लिया तो उन्हें इसी श्राप के कारण माता का वियोग सहना पड़ा।