भगवान श्री राम से पहले और वामन भगवान के जन्म से पहले भगवान विष्णु का एक अवतार हुआ था। यह अवतार संसारा में क्रोध का प्रतीक माना जाता है। इन्होंने स्वयं विष्णु के ही दूसरे अवतार को युद्घ के लिए ललकारा था। भगवान विष्णु के इस अवतार का नाम है परशुराम।
शास्त्रों के अनुसार इनका जन्म अक्षय तृतीया के दिन हुआ था जो भगवान विष्णु का प्रिय दिन माना जाता है। मान्यता है कि यह भी हनुमान जी की तरह चिरंजीवी हैं। यह पिता के परम भक्त और माता के प्रिय थे। इसके वावजूद एक बार इन्होंने अपने पिता के कहने से माता का सिर धड़ से अलग कर दिया था।
इस विषय में कथा है कि एक बार इनकी माता रेणुका जल का कलश लेकर नदी पर पानी लेने गई। इन्होंने देखा कि नदी में गंधर्व राज चित्ररथ अप्सराओं के साथ जलक्रीड़ा कर रहे हैं। इसे देखने में रेणुका इतनी तन्मय हो गयी कि जल लाने में विलंब हो गया।
उधर परशुराम के पिता यज्ञ के लिए जल का इंतजार कर रहे थे। लेकिन समय पर जल नहीं मिलने से यज्ञ का शुभ मुहूर्त बीत गया। रेणुका की भूल को जानकर परशुराम के पिता जमदग्नि ने अपने पुत्रों को रेणुका का वध करने के लिए कहा। लेकिन अन्य चार भाईयों ने ऐसा करने से मना कर दिया। लेकिन परशुराम ने पिता की आज्ञा को स्वीकार किया और माँ का वध कर दिया।
पिता जमदग्नि परशुराम से अति प्रसन्न हुए। इन्होंने परशुराम से वरदान मांगने के लिए कहा तो परशुराम ने वरदान स्वरूप माता के पुनः जीवित होने का वरदान मांग लिया। पिता ने प्रसन्न होकर माता को पुनर्जीवित कर दिया और परशुराम को चिरंजीवी होने का वरदान दिया। इसलिए कहा जाता है कि परशुराम जी आज भी जीवित हैं। लेकिन पृथ्वी का दान कर देने के कारण यह पृथ्वी पर निवास नहीं करते हैं।